10 शहरों की अनकही कहानी है दिल्‍ली, जानिए कब-कैसे उजड़ा और बसा अपना यह शहर

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10 शहरों की अनकही कहानी है दिल्‍ली, जानिए कब-कैसे उजड़ा और बसा अपना यह शहर

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Kahani Apni Dilli Ki: दिल्ली को अक्सर ‘सात शहरों’ का शहर कहा जाता है, लेकिन इतिहास बताता है कि यह लगभग दस बार उजड़ी और बसी. तोमरों के लाल कोट से लेकर पृथ्वीराज चौहान के किला राय पिथोरा, खिलजी की सीरी, तुगलकाबाद, फिरोजाबाद, मुगलों के शाहजहांनाबाद और अंग्रेजों की नई दिल्ली तक, हर दौर ने इस राजधानी को नया स्वरूप दिया. महाभारतकालीन इंद्रप्रस्थ की पौराणिक कथा भी इसकी पहचान का हिस्सा है. जानिए कैसे 1300 वर्षों से सत्ता, संस्कृति और स्थापत्य का केंद्र रही दिल्ली आज दुनिया के सबसे ऐतिहासिक महानगरों में गिनी जाती है.

दिल्ली को प्रायः ‘सात शहरों’ का शहर कहा जाता है, लेकिन ऐतिहासिक तथ्य इससे कहीं अधिक समृद्ध हैं. प्राचीन इंद्रप्रस्थ से लेकर आधुनिक नई दिल्ली तक, यह धरती लगभग 1,300 वर्षों से लगातार सत्ता का केंद्र रही है. तोमर, चौहान, खिलजी, तुगलक, मुगल और अंग्रेज सभी ने इस भूमि को अपनी राजधानी बनाने का सपना देखा. आज हम जिस दिल्ली में खड़े हैं, वह हर कदम पर इतिहास की कहानियां बुनती है. आइए, जानते हैं दिल्ली के उन दस शहरों के बारे में, जिन्होंने इस महानगर को आकार दिया.

इंद्रप्रस्थ: महाभारत के अनुसार, युधिष्ठिर को ‘खांडव प्रस्थ’ नामक बंजर भूमि मिली. देवशिल्पी मय दानव की मदद से उन्होंने उसे अद्भुत नगरी ‘इंद्रप्रस्थ’ में बदल दिया. कहा जाता है कि यह पुराने किले के नीचे बसा था, हालाँकि इसके पुरातात्विक प्रमाण अभी अपर्याप्त हैं. यह दिल्ली की मिथकीय विरासत का हिस्सा है.

लाल कोट (736 ई.): तोमर राजा अनंगपाल द्वारा बसाई गई यह दिल्ली की सबसे प्राचीन बस्ती थी, जिसे ‘ढिल्लिका’ कहा गया. लाल बलुआ पत्थर से निर्मित इस किले का उद्देश्य उत्तरी आक्रमणकारियों से बचाव था. कुछ कहानियां ऐसी भी है कि यहां गाड़ी गई कील ‘ढीली’ होने के कारण यह इस शहर का नाम ‘ढिल्ली’ पड़ा, जो बाद में बदलते-बदलते दिल्ली हो गया. आज साकेत और कुतुब मीनार क्षेत्र में इसके अवशेष मौजूद हैं.

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किला राय पिथोरा (12वीं सदी): पृथ्वीराज चौहान ने लाल कोट को छोटा समझकर उसका विस्तार किया और इसे एक विशाल किलेबंद शहर में बदल दिया. यह चौहान राजपूतों की प्रशासनिक व सैन्य राजधानी थी. तराइन के युद्ध (1192) में हार के बाद यह गुलाम वंश के हाथों चला गया. आज यह कुतुब मीनार परिसर का हिस्सा है, जहां राजपूत और मुस्लिम स्थापत्य का मेल देखने को मिलता है.

सीरी (1303 ई.): अलाउद्दीन खिलजी ने मंगोलों के खतरे से बचने के लिए पूरी तरह से नया व सुरक्षित शहर सीरी बसाया, जो आज का हौजखास इलाका है. यहां उसने विशाल किला व ‘हौज-ए-सुल्तानी’ जलाशय बनवाया. पानी की कमी और बाद के शासकों की उपेक्षा के कारण सीरी जल्द ही खंडहर हो गया. इसके अवशेष आज भी शाहपुर जाट के आसपास देखे जा सकते हैं.

तुगलकाबाद (1321-25 ई.): गियासुद्दीन तुगलक ने यमुना के किनारे एक विशाल ढलानदार दीवारों वाला किला बनवाया. सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के श्राप ‘तेरा शहर उजड़ जाएगा’ की कथा प्रसिद्ध है. गियासुद्दीन की मृत्यु के बाद उसके बेटे ने राजधानी दौलताबाद ले जाई, जिससे यह शहर सुनसान हो गया. आज यह एक रहस्यमयी किले के रूप में खड़ा है.

जहांपनाह (1327 ई.): मुहम्मद बिन तुगलक ने इसे ‘विश्व का आश्रय’ नाम दिया. उसने लाल कोट और सीरी के बीच विशाल दीवार खड़ी कर दोनों शहरों को जोड़कर एक संरक्षित क्षेत्र बनाया. राजधानी दौलताबाद स्थानांतरित करने और जल अभाव के कारण यह शहर विफल रहा. इसकी दीवारों के अवशेष आज भी दक्षिणी दिल्ली में देखे जा सकते हैं.

फिरोजाबाद (1354 ई.): फिरोज शाह तुगलक ने यह शहर आज के फिरोज शाह कोटला क्षेत्र में बसाया. वह प्राचीन स्मारकों का प्रेमी था. उसने अशोक का तोपरा स्तंभ ग्वालियर से उखड़वाकर अपने महल की छत पर लगवाया, जो आज भी मौजूद है. यह शहर अपनी नहरों और सुव्यवस्थित प्रशासन के लिए प्रसिद्ध रहा.

दीनपनाह / पुराना किला (1533-45 ई.): हुमायूं ने महाभारतकालीन इंद्रप्रस्थ के स्थल पर इसे ‘धर्म का आश्रय’ कहकर बसाया. शेरशाह सूरी ने हुमायूं को हराकर इस किले को मजबूत किया और इसे ‘शेरगढ़’ नाम दिया. आज यह ‘पुराना किला’ कहलाता है. यह स्थान मुगल-अफगान स्थापत्य का अद्भुत मिश्रण प्रस्तुत करता है.

शाहजहांनाबाद (1639-48 ई.): शाहजहां ने इसे भव्यता का प्रतीक बनाया, जिसे आज हम पुरानी दिल्ली कहते हैं. इसमें लाल किला (शाही महल), जामा मस्जिद (सबसे बड़ी मस्जिद) और चांदनी चौक (व्यापारिक सड़क) शामिल थे. यह दीवारों से घिरा एक समृद्ध नगर था. 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने इसे भारी नुकसान पहुंचाया था.

नई दिल्ली (1911-31 ई.): 1911 में ब्रिटिश सम्राट ने राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की. वास्तुकार लुटियंस और बेकर ने राजपथ से कनॉट प्लेस तक हरित नगर डिजाइन किया. यह ‘लुटियंस दिल्ली’ ब्रिटिश साम्राज्यवादी वास्तुकला का नमूना है. आज यहां संसद भवन व राष्ट्रपति भवन स्थित हैं.

दिल्ली केवल एक शहर नहीं, बल्कि सभ्यताओं का जीवंत संग्रहालय है. लाल कोट की नींव से लेकर लुटियंस की नई दिल्ली तक का यह सफर हमें बताता है कि यहां हर पत्थर कभी राजाओं का वैभव की कहानी कहता है, तो कभी उजड़ने का दर्द बयां करता है. इंद्रप्रस्थ की पौराणिक गाथा हो या शाहजहांनाबाद की मुगल भव्यता, सब इस धरती की अमिट विरासत हैं. आज जब हम इस राजधानी में सांस लेते हैं, तो हम स्वयं इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं. इसे संजोना और समझना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है.

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