18 साल के अली ने पिता को किडनी देकर बचाई जान, फादर्स डे पर रुला देगी ये कहानी

नई दिल्ली: फादर्स डे पर आमतौर पर लोग अपने पिता को कोई तोहफा देते हैं, लेकिन कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो रिश्तों की असली ताकत का मतलब समझा देती हैं. दिल्ली के 18 साल के अली ने अपने पिता को ऐसा गिफ्ट दिया, जिसकी कीमत किसी भी चीज से नहीं लगाई जा सकती. जब 49 साल के आबिद रजा गंभीर किडनी बीमारी से जूझ रहे थे और उनकी जिंदगी डायलिसिस के सहारे चल रही थी, तब परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक किडनी डोनर तलाशने की थी. हालात लगातार खराब हो रहे थे और समय तेजी से निकल रहा था. ऐसे मुश्किल दौर में अली ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपने पिता के लिए किडनी दान करने का फैसला लिया. यह फैसला सिर्फ एक मेडिकल प्रक्रिया नहीं था, बल्कि एक बेटे के अपने पिता के प्रति प्रेम, जिम्मेदारी और समर्पण की मिसाल बन गया.

आज के दौर में जहां रिश्तों को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं, वहीं अली और आबिद की कहानी उम्मीद जगाती है. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार 12वीं कक्षा में 92 प्रतिशत अंक हासिल करने वाला अली आगे की पढ़ाई की तैयारी कर रहा था, लेकिन उसने अपने भविष्य से पहले पिता की जिंदगी को प्राथमिकता दी. डॉक्टरों के सामने भी कई मेडिकल चुनौतियां थीं, क्योंकि दोनों का ब्लड ग्रुप अलग था. इसके बावजूद तकनीक और बेटे के मजबूत इरादे ने वह कर दिखाया जिसे कई लोग असंभव मानते हैं. फादर्स डे से पहले सामने आई यह कहानी हजारों परिवारों को भावुक कर रही है.

पिता की बिगड़ती हालत ने बढ़ाई चिंता

  • 49 साल के कारोबारी आबिद रजा एक दुर्लभ ऑटोइम्यून बीमारी से पीड़ित थे. इस बीमारी में शरीर की इम्यून सिस्टम खुद अपने अंगों पर हमला करने लगती है. इसके कारण उनकी किडनी तेजी से खराब होने लगी. मार्च 2025 में उनकी हालत इतनी गंभीर हो गई कि उन्हें सप्ताह में तीन बार डायलिसिस कराना पड़ रहा था. डॉक्टरों ने स्पष्ट कर दिया था कि लंबी और बेहतर जिंदगी के लिए किडनी ट्रांसप्लांट ही सबसे अच्छा विकल्प है. उपयुक्त डोनर की तलाश शुरू हुई लेकिन परिवार को कोई सही विकल्प नहीं मिल पाया. समय बीतने के साथ आबिद की सेहत और बिगड़ती जा रही थी. इसी दौरान अली ने अपने पिता के लिए किडनी दान करने की इच्छा जताई. परिवार और डॉक्टरों ने जरूरी जांच शुरू कर दी.
  • हालांकि जांच में एक बड़ी समस्या सामने आई. अली का ब्लड ग्रुप बी-पॉजिटिव था, जबकि उनके पिता का ब्लड ग्रुप ओ-पॉजिटिव था. सामान्य परिस्थितियों में ऐसे ब्लड ग्रुप के बीच किडनी ट्रांसप्लांट करना आसान नहीं माना जाता और अंग रिजेक्शन का खतरा बढ़ जाता है.

डॉक्टरों ने अपनाई एडवांस तकनीक

मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, पटपड़गंज के डॉक्टरों ने एबीओ-इनकंपैटिबल किडनी ट्रांसप्लांट करने का फैसला लिया. यह एक एडवांस मेडिकल प्रोसेस है, जिसमें मरीज के शरीर में मौजूद उन एंटीबॉडी को कम किया जाता है जो नई किडनी पर हमला कर सकती हैं. इसके लिए डिसेंसिटाइजेशन प्रक्रिया अपनाई गई. प्लाज्माफेरेसिस और विशेष दवाओं की मदद से शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को नियंत्रित किया गया. डॉक्टरों के अनुसार यह तकनीक उन मरीजों के लिए नई उम्मीद बन रही है, जिन्हें उपयुक्त डोनर मिलने में कठिनाई होती है.

सफल रहा ऑपरेशन, दोनों स्वस्थ

डॉ. रवि कुमार सिंह और डॉ. परेश जैन की टीम ने सफलतापूर्वक ट्रांसप्लांट किया. ऑपरेशन के तुरंत बाद नई किडनी ने काम करना शुरू कर दिया, जिसे मेडिकल भाषा में ‘गुड ग्राफ्ट फंक्शन’ कहा जाता है. सर्जरी के चार दिन बाद अली को अस्पताल से छुट्टी मिल गई, जबकि आबिद एक सप्ताह के भीतर घर लौट आए. डॉक्टरों का कहना है कि दोनों की रिकवरी अच्छी रही. अली का यह फैसला अब सिर्फ एक मेडिकल सफलता नहीं, बल्कि पिता-पुत्र के रिश्ते की प्रेरणादायक मिसाल बन चुका है.

एबीओ-इनकंपैटिबल किडनी ट्रांसप्लांट क्या होता है?

एबीओ-इनकंपैटिबल किडनी ट्रांसप्लांट वह प्रक्रिया है, जिसमें डोनर और रिसीवर का ब्लड ग्रुप अलग होने के बावजूद ट्रांसप्लांट किया जाता है. इसके लिए मरीज के शरीर में मौजूद उन एंटीबॉडी को पहले कम किया जाता है जो नई किडनी को नुकसान पहुंचा सकती हैं. आधुनिक तकनीकों की वजह से अब ऐसे ट्रांसप्लांट की सफलता दर पहले की तुलना में काफी बेहतर हो गई है.

किडनी दान करने वाले व्यक्ति की जिंदगी पर क्या असर पड़ता है?

डॉक्टरों के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति एक किडनी के साथ भी सामान्य जीवन जी सकता है. किडनी दान करने के बाद नियमित स्वास्थ्य जांच, संतुलित खानपान और स्वस्थ जीवनशैली जरूरी होती है. अधिकतर डोनर पढ़ाई, नौकरी, खेलकूद और सामान्य गतिविधियां पहले की तरह जारी रख सकते हैं.

भारत में अंगदान को बढ़ावा देने की जरूरत क्यों है?

भारत में हर साल हजारों मरीज किडनी, लिवर और अन्य अंगों के प्रत्यारोपण का इंतजार करते हैं. लेकिन अंगदान करने वालों की संख्या जरूरत के मुकाबले बहुत कम है. जागरूकता बढ़ने से अधिक मरीजों को समय पर अंग मिल सकते हैं और कई लोगों की जान बचाई जा सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि अंगदान समाज के लिए सबसे बड़ा मानवीय योगदान माना जाता है.

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