नई दिल्ली: लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और अन्य प्रदर्शनकारियों से जुड़े इस केस की सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट में चल रही है. हाई कोर्ट ने जंतर मंतर पर हुए लाठीचार्ज के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है. कोर्ट ने पुलिस प्रशासन से चार हफ्ते के भीतर विस्तृत जवाब मांगा है. इसके साथ ही सभी सीसीटीवी फुटेज और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को सुरक्षित रखने का कड़ा आदेश दिया गया है. याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने पुलिस की इस कार्रवाई को क्रूरता की पराकाष्ठा बताया है. उनका आरोप है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस ने मवेशियों की तरह लाठियां भांजी. अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर को होनी है.
जंतर मंतर पर प्रदर्शनकारियों के साथ ‘क्रूरता की पराकाष्ठा’: याचिकाकर्ता
जंतर मंतर पर चल रहे प्रदर्शन के मामले में कोर्ट में तीखी बहस देखने को मिली. सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन और एन हरिहरन याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश हुए. इन वकीलों ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए. वकील हरिहरन ने अदालत को बताया कि शुरुआत में यह प्रदर्शन पूरी तरह से शांतिपूर्ण था. वहां मौजूद सभी लोग अपने मौलिक अधिकारों का स्वतंत्र रूप से प्रयोग कर रहे थे. उन्होंने कहा कि पुलिस की यह कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मनमानी की कसौटी पर परखी जाएगी. पुलिस का यह एक्शन पूरी तरह से असंवैधानिक था.
हरिहरन ने पुलिस कार्रवाई को क्रूरता की पराकाष्ठा करार दिया. उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के साथ ऐसा बर्ताव संविधान प्रदत्त अधिकारों का सीधा उल्लंघन है. इस तरह का पुलिस एक्शन किसी भी लोकतांत्रिक देश में स्वीकार्य नहीं हो सकता है.
वकील हरिहरन ने कोर्ट में पुलिस की बर्बरता का क्या बताया?
याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट एन हरिहरन ने कोर्ट में पुलिस की क्रूरता का पूरा ब्योरा दिया. उन्होंने कहा कि जंतर मंतर पर लोग शांतिपूर्ण तरीके से अपनी सभा कर रहे थे. यह इस देश के हर नागरिक का सबसे पहला और बुनियादी अधिकार है. छात्र और आम लोग शांतिपूर्ण विरोध का अपना अधिकार जता रहे थे. इन छात्रों को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत भी जीवन और सुरक्षा का अधिकार मिला हुआ है. इसलिए सरकार की लाठीचार्ज वाली कार्रवाई को कानूनी कसौटी पर परखा जाना बेहद जरूरी है. हरिहरन ने कहा कि घटना के दिन जो हुआ वह पूरी तरह से अकल्पनीय था. पुलिस ने नागरिकों पर हद से ज्यादा बर्बरता दिखाई.
उन्होंने यह भी साफ किया कि सरकार के पास आंदोलन को नियंत्रित करने का अधिकार है. लेकिन भीड़ को काबू करने के नाम पर ऐसी हिंसक कार्रवाई को सही नहीं ठहराया जा सकता है. पुलिस बल का इस्तेमाल ऐसे किया गया जैसे मवेशियों को हांका जा रहा हो.
क्या प्रदर्शनकारियों पर कील लगी लाठियों और छर्रों से हमला किया गया?
कोर्ट में सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने भी याचिकाकर्ताओं का मजबूती से पक्ष रखा. उन्होंने बताया कि प्रदर्शनकारियों ने पहले ही ऐलान किया था कि वे 20 तारीख को संसद तक मार्च करेंगे. इस मार्च के लिए सभी लोग 20 तारीख को ही जंतर मंतर पर इकट्ठा हुए थे. 19 तारीख तक वहां किसी भी तरह की कोई हिंसा नहीं हुई थी. संसद तक मार्च की जानकारी पब्लिक डोमेन में पहले से मौजूद थी. इसी वजह से 20 तारीख को वहां भीड़ बढ़ने लगी थी.
विकास सिंह ने कहा कि इसी शांतिपूर्ण भीड़ पर अचानक हमला कर दिया गया. इस भीड़ में लड़के और लड़कियां दोनों शामिल थे. वहां हर तरह के परिवारों के बच्चे मौजूद थे. पब्लिक डोमेन में ऐसा कोई सबूत नहीं है जो साबित करे कि भीड़ हिंसक हो गई थी.
वकील हरिहरन ने कहा कि पुलिस ने कील लगी लाठियों का इस्तेमाल किया. इन लाठियों से छोटे बच्चों तक को बुरी तरह पीटा गया. वहां छर्रे और इलेक्ट्रिक बैटन का भी इस्तेमाल हुआ. यह सोचने वाली बात है कि क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन से निपटने का यही एक क्रूर तरीका है.
क्या सादे कपड़ों में आए अज्ञात लोगों ने पुलिस के साथ मिलकर पीटा?
अदालत में पुलिस की वर्दी और पहचान को लेकर भी कई गंभीर आरोप लगाए गए. वकीलों ने बताया कि कई वीडियो फुटेज में सादे कपड़ों में लोग बैठे हुए दिख रहे हैं. इन अज्ञात लोगों ने पुलिस के साथ मिलकर प्रदर्शनकारियों पर सीधा हमला किया.
सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने कहा, ‘मैंने ऐसे 130 से ज्यादा वीडियो देखे हैं’. ये वीडियो केस के लिए बहुत अहम सबूत हैं. इनमें से बहुत से लोगों ने पुलिस की वर्दी तक नहीं पहनी थी. वहीं जिन लोगों ने वर्दी पहनी थी उन्होंने अपने नेम टैग हटा दिए थे. उनके पास ऐसे हथियार थे जिनकी दिल्ली पुलिस में इस्तेमाल की इजाजत भी नहीं है. यह साफ तौर पर पुलिस के नियमों का खुला उल्लंघन है. सादे कपड़ों में गुंडों का पुलिस के साथ मिलकर लोगों को पीटना एक भयानक साजिश की तरफ इशारा करता है. हम इस पूरे मामले की निष्पक्ष न्यायिक जांच की मांग कर रहे हैं.
डीसीपी संदीप लांबा पर महिला को सरेआम थप्पड़ मारने का क्या आरोप है?
इस मामले में दिल्ली पुलिस के एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा का नाम भी प्रमुखता से उछला है. कोर्ट में एक वीडियो का खास तौर पर जिक्र किया गया. इस वीडियो में डीसीपी संदीप लांबा एक महिला को सरेआम थप्पड़ मारते हुए नजर आ रहे हैं. वकीलों ने बताया कि वह महिला वहां चुपचाप खड़ी थी और कुछ भी नहीं कर रही थी. डीसीपी लांबा उस महिला के पास से गुजरते हैं और अचानक उसके चेहरे पर जोरदार थप्पड़ जड़ देते हैं.
याचिकाकर्ता वकील ने डीसीपी के खिलाफ सख्त दलीलें दीं. उन्होंने कोर्ट से मांग की कि डीसीपी लांबा को तुरंत अदालत में तलब किया जाना चाहिए. ऐसे अधिकारी को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाना चाहिए. एक पुलिस अधिकारी का निहत्थी महिला पर हाथ उठाना बेहद शर्मनाक है. वकील ने कहा कि पुलिस को दिशा निर्देश जारी होने चाहिए. उन्हें बताना चाहिए कि भीड़ नियंत्रण के दौरान किस तरह की आचार संहिता का पालन करना जरूरी है.
प्रदर्शनकारियों पर दोष मढ़ने के लिए गाड़ी के शीशे किसने तोड़े?
सीनियर एडवोकेट शंकरनारायणन ने कहा कि उनके पास काफी वीडियो और पक्के सबूत मौजूद हैं. सुबह के समय का एक और वीडियो कोर्ट के संज्ञान में लाया गया. हालांकि अभी तक इस वीडियो की पूरी तरह से पुष्टि नहीं हो पाई है. इस वीडियो में एक कार दिख रही है जिसकी विंडशील्ड बुरी तरह टूटी हुई है. इसके अलावा एक और वीडियो है जिसमें एक गाड़ी पत्थरों से भरी हुई नजर आ रही है.
वकीलों ने आरोप लगाया कि यह सब प्रदर्शनकारियों पर झूठा दोष मढ़ने के लिए किया गया. यह एक सोची समझी साजिश का हिस्सा था ताकि पुलिस लाठीचार्ज को सही ठहरा सके. मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए इन सभी वीडियो की फोरेंसिक जांच होनी चाहिए. कोर्ट ने इन दलीलों को बहुत गंभीरता से सुना है. सच सामने लाने के लिए पुलिस की जवाबदेही तय करना बहुत जरूरी हो गया है.
एएसजी एसवी राजू ने प्रदर्शनकारियों की याचिका को पब्लिसिटी स्टंट कहा
केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से अदालत में एएसजी एसवी राजू पेश हुए. उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि सॉलिसिटर जनरल दूसरी अदालत में व्यस्त हैं. इसलिए वे सरकार की तरफ से दलीलें पेश कर रहे हैं. एएसजी ने वांगचुक को जबरन हटाए जाने से जुड़ी पीआईएल का सीधा जिक्र किया. उन्होंने कहा कि इस मामले में कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है. वांगचुक या उनकी पत्नी ने पुलिस में कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई है. ऐसा लगता है कि यह याचिका सिर्फ पब्लिसिटी पाने के लिए दायर की गई है. इस मामले में मीडिया की दिलचस्पी है इसलिए इसे बेवजह तूल दिया जा रहा है.
एएसजी ने मांग की कि इस जनहित याचिका को तुरंत खारिज कर दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि यह याचिका निजी जानकारी पर नहीं बल्कि सोशल मीडिया वीडियो पर आधारित है. यह सिर्फ सुर्खियां बटोरने का एक जरिया मात्र है.
क्या पुलिसकर्मियों के घायल होने के वीडियो भी अदालत में मौजूद हैं?
एएसजी एसवी राजू ने अपनी दलील को आगे बढ़ाते हुए प्रदर्शनकारियों पर भी गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि कुछ पुलिस अधिकारी भी इस पूरे बवाल में घायल हुए थे. हालांकि वकील हरिहरन ने तुरंत इसका खंडन करते हुए कहा कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा है.
एएसजी ने कहा कि अगर सीसीटीवी कैमरे सुरक्षित नहीं रखे गए तो यह सिर्फ आरोप प्रत्यारोप का खेल बन जाएगा. ऐसे कई वीडियो मौजूद हैं जिनसे साफ पता चलता है कि पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं. यह एक जानी मानी बात है कि तथाकथित शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को हाईजैक कर लिया जाता है. कुछ राजनीतिक पार्टियां ऐसे मौकों का गलत फायदा उठाना चाहती हैं. इसलिए यह कोई पूरी तरह से शांतिपूर्ण आंदोलन नहीं था. प्रदर्शनकारियों की भीड़ बेकाबू हो गई थी और उसने हिंसा का रास्ता अपना लिया था. पुलिस ने धारा 144 के तहत रोक लगाने वाले आदेश पहले ही लागू कर दिए थे. इसी भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस को एफआईआर दर्ज करनी पड़ी.
दिल्ली हाई कोर्ट ने पुलिस से सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने को क्यों कहा?
दिल्ली हाई कोर्ट ने एएसजी की दलीलों पर कड़े सवाल दागे. चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय की बेंच ने कहा कि क्या यह कोई अकेली घटना थी. कोर्ट ने खुद जवाब देते हुए कहा कि शायद यह कोई साधारण मामला नहीं है. अगर यह सच में गैर कानूनी जमावड़ा था तो उससे निपटने का एक तय कानूनी तरीका होता है. कोर्ट ने कहा कि अगर पीआईएल में इतने बड़े मुद्दे उठाए जा रहे हैं तो हर व्यक्ति पुलिस के पास नहीं जा सकता. अगर घटना छोटी होती तो लोगों को प्राइवेट शिकायत दर्ज कराने के लिए कहना सही होता.
कोर्ट ने साफ किया कि वह अभी किसी भी वीडियो की पुष्टि नहीं कर रहा है. लेकिन आरोप इतने गंभीर हैं कि पुलिस को अपना जवाब दाखिल करना ही होगा. दिल्ली हाई कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि वह तुरंत सभी सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित करे. पुलिस को अपनी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर के अनुसार सारा रिकॉर्ड अदालत के सामने पेश करना होगा.
दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया कि व्यक्तिगत आपराधिक दायित्व के अलावा पब्लिक लॉ के तहत भी कानूनी उपाय अपनाया जा सकता है. इस तरह की कोई भी बड़ी घटना पब्लिक लॉ के तहत सुनवाई का आधार बन सकती है.
इन सभी दलीलों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने केंद्र और पुलिस को औपचारिक नोटिस भेज दिया है. दिल्ली हाई कोर्ट ने पुलिस से चार हफ्ते के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है. इसके बाद याचिकाकर्ताओं को अपना काउंटर जवाब दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का अतिरिक्त समय दिया गया है. इस जनहित याचिका पर अब अगली सुनवाई 11 सितंबर को होगी.
