लखनऊ. देश में नीट छात्रों को लेकर बवाल मचा हुआ है. संसद से सड़क तक मार्च हो रहे हैं. जंतर-मंतर पर हजारों छात्र जुटे हुए हैं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव इस मौके को भुनाने में मैदान पर उतर गए हैं. लेकिन यूपी में कभी जिस पार्टी का सिक्का चलता है, वह अभी भी हाथी की चाल में भी नहीं चल रहा है. बल्कि ऐसा लगता है कि हाथी गर्मी से परेशान होकर किसी पेड़ की नीचे बैठ गया है. उत्तर प्रदेश में इस समय सियासी पारा चढ़ा हुआ है. नीट परीक्षा में धांधली, बेरोजगारी और युवा आंदोलनों के समर्थन में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव दिल्ली से लेकर लखनऊ तक सड़कों पर उतर रहे हैं, तब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि बहुजन समाज पार्टी और उसकी सुप्रीमो मायावती कहां हैं?
चार बार उत्तर प्रदेश की कमान संभाल चुकीं मायावती और उनकी पार्टी कभी उत्तर प्रदेश में दलित और बहुजन राजनीति की सबसे मजबूत धुरी हुआ करती थी. लेकिन बीते कुछ वर्षों के चुनावी आंकड़े और चंद्रशेखर आजाद का उभार बीएसपी के अस्तित्व पर गंभीर राजनीतिक सवाल खड़े कर रहा है. मायावती का गिरता ग्राफ और बीएसपी का बदलता जनाधार 2007 में अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बीएसपी का जनाधार पिछले तीन-चार चुनावों से लगातार गिर रहा है.
क्या मायावती दलित वोटरों को लुभा पाएंगी?
मायावती यूपी चुनाव 2027 में कितना बड़ा चेहरा?
2012 में बीएसपी सत्ता से बाहर हुई, 2017 में केवल 19 सीटों पर सिमटी और 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी इतिहास के सबसे निचले स्तर पर महज 1 सीट और करीब 12.88% वोट शेयर पर आ गई.
2024 लोकसभा चुनाव का झटका: 2024 के आम चुनावों में बीएसपी उत्तर प्रदेश की सभी 80 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ी, लेकिन पार्टी का खाता तक नहीं खुला और उसका कुल वोट शेयर घटकर 10 प्रतिशत से भी नीचे खिसक गया.
प्रेस कॉन्फ्रेंस बनाम कैडर कनेक्ट
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मायावती का जमीनी आंदोलनों और सड़कों की लड़ाई से दूरी बनाना, सिर्फ लखनऊ या दिल्ली में बंद कमरों की प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित रहना, उनके काडर को उनसे दूर कर रहा है.
क्या चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी ले रही बीएसपी की जगह?
आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद का ग्राफ विशेष रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जाटव-दलित युवाओं के बीच तेजी से बढ़ा है. 2024 के लोकसभा चुनाव में चंद्रशेखर आजाद ने बिना किसी बड़े गठबंधन के नगीना सीट से 1.5 लाख से अधिक वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की. उन्होंने बीजेपी और सपा दोनों के उम्मीदवारों को पछाड़कर यह साबित किया कि दलित युवा अब एक आक्रामक और जमीनी नेता की तलाश में है, जो सड़कों पर उनके साथ खड़ा हो सके.
क्या 2027 में बीएसपी का वजूद पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीएसपी का वजूद पूरी तरह से खत्म कहना शायद अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन 2027 का चुनाव मायावती के लिए करो या मरो की लड़ाई है. अगर मायावती ने कैडर को बुस्टअप नहीं किया तो, 2022 और 2024 से भी ज्यादा खराब स्थिति हो सकती है. क्योंकि इस बार तो अखिलेश यादव का पीडीए पॉलिटिक्स मास्टर स्ट्रोक्स से असदुद्दीन ओवैसी भी सपा-कांग्रेस के साथ आना चाह रहे हैं. चंद्रशेखर आजाद लगातार संसद में आवाज बुलंद कर रहे हैं. इधर बीते कुछ घंटों से दिल्ली में छात्रों के लाठीचार्ज के विरोध में वह संसद भवन में धरने पर बैठे हुए हैं, जिससे युवाओं में एक खास मैसेज जा रहा है.
क्या कहते हैं राजनीतिक विश्लेषक?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में अब द्विध्रुवीय राजनीति हावी हो रही है. एक तरफ बीजेपी का एनडीए गठबंधन और दूसरी तरफ सपा-कांग्रेस का इंडिया ब्लॉक. जब बीएसपी अकेले मैदान में उतरती है, तो मतदाता उसे रेस से बाहर मानकर अपना वोट बीजेपी या सपा-कांग्रेस को ट्रांसफर कर देते हैं. अगर मायावती ने 2027 से पहले अपने पारंपरिक कैडर को एकजुट करने के लिए जमीनी रणनीति नहीं बदली, तो जाटव वोट बैंक का बड़ा हिस्सा चंद्रशेखर आजाद और सपा-कांग्रेस गठबंधन के बीच बंट सकता है.
हालांकि, मायावती ने हालिया सम्मेलनों में फिर से सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के तहत ब्राह्मण और अन्य जातियों को टिकट बांटकर 2007 जैसा सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला दोहराने का दावा किया है. लेकिन सड़क से संसद तक उठते तूफानों के बीच, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बीएसपी 2027 में अपनी खोई हुई सियासी जमीन वापस पा सकती है या नहीं.
