दीवार से दुनिया तक ऐसे पहुंची मधुबनी पेंटिंग, इंदिरा गांधी ने पद्मश्री देकर सीता देवी का बढ़ाया था सम्मान, अब विरासत को बढ़ा रहे मनोज

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दीवार से दुनिया तक ऐसे पहुंची मधुबनी पेंटिंग, सीता देवी को मिला है पद्मश्री

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Madhubani Painting News: मधुबनी पेंटिंग पहले दीवारों पर बनती थी. इंदिरा गांधी के कहने पर मधुबनी की सीता देवी ने इसे कागज पर बनाया. वहीं, दिल्ली आईएनए हॉट में पहुंचे बिहार के मनोज कुमार झा ने बताया कि उनकी दादी सीता देवी को मधुबनी पेंटिंग के लिए पद्मश्री मिला था.वह खुद स्टेट अवॉर्डी हैं. उनके परिवार द्वारा बनाई गई पेंटिंग गांधी परिवारा को बहुत ही पसंद आती है.

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नई दिल्ली: क्या आप जानते हैं कि बिहार की मधुबनी पेंटिंग पहले दीवार पर बनाई जाती थी. इसको कागज पर उतारने का काम तब हुआ. जब इंदिरा गांधी की ओर से राहत काम के लिए भेजे गए एक अधिकारी ने दीवार पर इस खूबसूरत सी पेंटिंग को देखा और वहां मौजूद कलाकार सीता देवी से कहा कि इसी पेंटिंग को पेपर पर बनाएं. पेपर भी अधिकारियों की ओर से दिए गए. तब सीता देवी ने मधुबनी पेंटिंग को पेपर पर बनाया जिसकी बड़ी सी प्रदर्शनी 1962 के करीब दिल्ली की एंबेसी में लगाई गई, जिसकी बहुत जबरदस्त बिक्री हुई.

यहीं से मधुबनी पेंटिंग की ओर सरकार का ध्यान गया और इंदिरा गांधी ने सीता देवी को पद्मश्री से सम्मानित किया. आज इंदिरा गांधी से लेकर राहुल गांधी तक जिस परिवार द्वारा बनाई गई मधुबनी पेंटिंग के दीवाने हैं. उनका नाम है मनोज कुमार झा है. जो कि बिहार के रहने वाले हैं. उनकी दादी सीता देवी को इंदिरा गांधी ने पद्मश्री से सम्मानित किया था. मधुबनी पेंटिंग इंदिरा गांधी को बहुत पसंद थी. आज भी गांधी परिवार मधुबनी पेंटिंग को काफी पसंद करता है. जब भी मधुबनी पेंटिंग लेनी होती है तो उनके ही परिवार से संपर्क किया जाता है. इन दिनों आईएनए दिल्ली हाट में पहुंचे हुए मनोज कुमार झा से खास बातचीत की गई तो उन्होंने विस्तार से पूरी जानकारी दी.

4 लाख रुपए तक की मधुबनी पेंटिंग हाथों से हैं बनाते

मनोज कुमार झा ने बताया कि मधुबनी पेंटिंग हमेशा हाथों से बनाई जाती है. छोटी पेंटिंग को बनाने के लिए दो से तीन दिन लगते हैं. जबकि बड़ी पेंटिंग को बनाने के लिए तीन से चार महीने का वक्त लग जाता है. जितनी बारीक पेंटिंग होगी. उतना ज्यादा टाइम इसमें लगता है. उन्होंने बताया कि उनके पास 500 रुपए से लेकर के तीन से चार लाख रुपए तक की पेंटिंग्स मौजूद हैं. यह बिकती भी है और लोगों को काफी पसंद आती है.

उन्होंने बताया कि उनके गांव में वर्तमान में तीन से चार कलाकार पद्मश्री हैं. उनकी दादी सीता देवी परिवार की पहली पद्मश्री रही और मनोज कुमार झा खुद स्टेट अवॉर्डी हैं. 2006 और 2007 में उन्हें दिल्ली में ही स्टेट अवार्ड मधुबनी पेंटिंग के लिए दिया गया था.

कलाकार बढ़ रहे लेकिन मार्केट सिमट रहा

मनोज कुमार झा ने बताया कि पहले मधुबनी पेंटिंग के कलाकार बहुत कम हुआ करते थे, लेकिन वर्तमान में सिर्फ बिहार में ही 5000 से ज्यादा कलाकार मधुबनी पेंटिंग बना रहे हैं. यह कला कभी विलुप्त हो ही नहीं सकती है. क्योंकि देश विदेश तक इस पेंटिंग की डिमांड है, लेकिन मार्केट सिमट रहा है. यानी मार्केट वैसा नहीं है, जैसा होना चाहिए. 12 महीने बिक्री और खरीदारी नहीं होती है. बड़ी-बड़ी प्रदर्शनी में जब जाते हैं, तब लोगों को पेंटिंग पसंद आती है और खरीदने वाले इसे खरीदते हैं. उन्होंने बताया कि इसमें खादी पेपर का इस्तेमाल किया जाता है और फूल पत्ती का कलर होता है. तभी इस पेंटिंग को बनाया जाता है. इसमें लंबा वक्त और मेहनत लगती है, इसलिए यह पेंटिंग थोड़ी महंगी भी होती है.

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Brijendra Pratap Singh

बृजेंद्र प्रताप सिंह डिजिटल-टीवी मीडिया में (2021) लगभग 5 सालों से सक्रिय हैं. मेट्रो न्यूज 24 टीवी चैनल मुंबई, ईटीवी भारत, दैनिक भास्कर के अनुभव के साथ 14 मई 2024 से  Hindi.News18.com<…

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