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Leftover Dal Using Tips for Gardening: अगर घर में बची हुई दाल को आप बेकार समझकर फेंक देते हैं, तो यह जानकारी आपके काम की है. बासी दाल पौधों के लिए बेहतरीन प्राकृतिक खाद का काम कर सकती है. इसमें मौजूद प्रोटीन, नाइट्रोजन और अन्य पोषक तत्व मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और पौधों की जड़ों को मजबूत बनाने में मदद करते हैं. दाल को 5 से 10 गुना पानी में घोलकर हर 15 से 20 दिन में पौधों की जड़ों में डालने से अच्छे परिणाम मिल सकते हैं. हालांकि, अधिक नमक, तेल या मसालों वाली दाल का उपयोग नहीं करना चाहिए.
वैसे तो हर घर की भोजन की थाली में दाल सबसे ज्यादा बनने वाले व्यंजनों में से एक है. आमतौर पर घर में बची हुई या बासी हो चुकी दाल को उसकी गंध के कारण लोग बेकार समझकर फेंक देते हैं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यही बासी दाल आपके घर के गमलों और किचन गार्डन के पौधों के लिए बेहतरीन देसी खाद बन सकती है. दाल में मौजूद प्राकृतिक पोषक तत्व मिट्टी की उर्वरता और गुणवत्ता सुधारने में मदद करते हैं तथा पौधों की ग्रोथ को बेहतर बना सकते हैं. हालांकि इसका उपयोग सही तरीके और सही मात्रा में करना जरूरी है. उचित तरीके से इस्तेमाल करने पर बासी दाल पौधों को धीरे-धीरे आवश्यक पोषण प्रदान करती है.
दाल में प्रोटीन, नाइट्रोजन और कई महत्वपूर्ण पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मददगार माने जाते हैं. ऐसे में यदि दाल में अधिक तेल, घी, नमक या तीखे मसाले नहीं हैं, तो इसका उपयोग पौधों के लिए आसानी से किया जा सकता है. सबसे आसान तरीका यह है कि बची हुई दाल में 5 से 10 गुना पानी मिलाकर उसे अच्छी तरह घोल लें. इसके बाद इस घोल को पौधों की जड़ों के आसपास धीरे-धीरे डालें. इस घोल का उपयोग हर 15 से 20 दिन में एक बार करना बेहतर माना जाता है. इससे पौधों को धीरे-धीरे आवश्यक पोषण मिलता रहता है और मिट्टी की नमी भी लंबे समय तक बनी रहती है.
अगर आप घर पर कम्पोस्ट खाद तैयार करते हैं, तो बासी दाल उसमें भी काफी उपयोगी साबित हो सकती है. दाल को सीधे कम्पोस्ट में डालने के बजाय उसके साथ सूखे पत्ते, कागज के छोटे टुकड़े, सूखी घास या भूसा मिलाना बेहतर रहता है. इससे कम्पोस्ट में नमी और कार्बन का संतुलन बना रहता है और खाद जल्दी तैयार होती है. कुछ सप्ताह बाद यही मिश्रण उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद में बदल जाता है, जिसे सभी प्रकार के पौधों में इस्तेमाल किया जा सकता है. इस तरीके से रसोई का कचरा भी कम होता है और बाजार से महंगी खाद खरीदने की जरूरत भी घट जाती है.
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कई बार लोगों के मन में यह सवाल भी आता है कि बासी दाल का इस्तेमाल किन पौधों में किया जा सकता है. इसका उपयोग कई तरह के पौधों में किया जा सकता है. तुलसी, मनी प्लांट, गेंदा, गुलाब, एलोवेरा, स्नेक प्लांट और अन्य सजावटी पौधों के अलावा टमाटर, मिर्च, बैंगन, धनिया और पालक जैसी सब्जियों वाले पौधों में भी इसका सीमित मात्रा में उपयोग किया जा सकता है. दाल से मिलने वाले पोषक तत्व पौधों की जड़ों को मजबूत बनाने में मदद करते हैं, जिससे उनकी वृद्धि बेहतर होती है. इसके अलावा, पौधों में नई पत्तियां निकलने की प्रक्रिया भी तेज हो सकती है.
हालांकि, बासी दाल का उपयोग करते समय कुछ सावधानियां बरतना भी जरूरी है. बहुत अधिक नमक, तेल, घी या मिर्च-मसालों वाली दाल को सीधे पौधों में नहीं डालना चाहिए. ऐसे पदार्थ मिट्टी की गुणवत्ता को खराब कर सकते हैं और पौधों की जड़ों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इसी तरह, एक बार में अधिक मात्रा में दाल डालने से मिट्टी में बदबू आने लगती है और मक्खियां या अन्य कीड़े भी आकर्षित हो सकते हैं. इसलिए हमेशा कम मात्रा में और उचित अंतराल पर ही इसका उपयोग करें. यदि दाल कई दिनों पुरानी हो गई है और उसमें तेज दुर्गंध या फफूंदी दिखाई दे रही है, तो उसे सीधे गमले में डालने के बजाय कम्पोस्ट में मिलाना अधिक सुरक्षित और बेहतर विकल्प माना जाता है.
घर में मिलने वाली जैविक यानी देसी सामग्री का सही उपयोग करने से पौधों को प्राकृतिक पोषण मिलता है और रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होती है. बासी दाल भी ऐसे ही घरेलू संसाधनों में से एक है, जिसका सही तरीके और उचित मात्रा में उपयोग किया जाए तो यह पौधों के लिए लाभदायक साबित हो सकती है. इसके साथ ही रसोई से निकलने वाले सब्जियों के छिलके, इस्तेमाल की हुई चाय की पत्ती और फलों के छिलकों का भी सही तरीके से कम्पोस्ट बनाकर उपयोग किया जा सकता है. इससे पौधों को जैविक पोषण मिलता है और घर का जैविक कचरा भी उपयोगी खाद में बदल जाता है.
अगर आप चाहते हैं कि आपके घर के गमलों या किचन गार्डन के पौधे बिना ज्यादा खर्च के स्वस्थ और तेजी से बढ़ें, तो बासी दाल का सही तरीके से उपयोग एक अच्छा विकल्प हो सकता है. उचित मात्रा में और सही विधि से इस्तेमाल करने पर यह पौधों को प्राकृतिक पोषण प्रदान करती है तथा मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद करती है. साथ ही, यह रसोई से निकलने वाले जैविक कचरे का बेहतर प्रबंधन करने का भी आसान तरीका है, जिससे रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होती है और पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान मिलता है.
