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स्वतंत्रता दिवस जैसे-जैसे करीब आ रहा है, दिल्ली के सदर बाजार की गलियां तिरंगे से पूरी तरह सराबोर होती जा रही हैं. सदर बाजार की इन्हीं गलियों में एक ऐसा परिवार भी है , जिसने बीते 64 सालों से तिरंगे की विरासत को मजबूती से थाम रखा है. 1962 में तिरंगा बनाने का काम शुरू करने वाले गफ्फार भाई की क्या है पूरी कहानी, जानने के लिए पढ़ें आगे…
सदर बाजार के गफ्फार भाई का परिवार तीन पीढि़यों से तिरंगा बनाने के काम में लगा हुआ है.
Har Ghar Tiranga Campaign: दिल्ली का सदर बाजार इन दिनों तिरंगे से सराबोर नजर आ रहा है. इलाके की तमाम तंग गलियां तिरंगे के रंगों में रंगी नजर आ रही हैं. इन्हीं गलियों में एक विरासत ऐसी है, जो बीते 64 सालों से तिरंगे को मजबूती से थामे हुए है. जी हां, यह कहानी 1962 से तिरंगे बना रहे गफ्फार भाई और उनकी तीन पीढि़यों की है. गफ्फार भाई ने 1962 में तिरंगा बनाने का काम शुरू किया था. भले ही आज वह इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी विरासत को उनकी तीसरी पीढि़यों ने बखूबी थाम रखा है.
अब्दुल मलिक, अब्दुल सलाम, मोहम्मद इस्माइल और बिलाल… ये वे नाम हैं, जिनके हाथों में आज भी तिरंगे की सिलाई और उसे आकार देने का जिम्मा है. पूरा परिवार करीब छह महीने से स्वतंत्रता दिवस की तैयारियों में जुटा हुआ है. जैसे-जैसे 15 अगस्त की तारीख करीब आ रही है, चप्पे-चप्पे को तिरंगे से सराबोर करने का जुनून बढ़ता जा रहा है. इस जुनून को पूरा करने के लिए इस वक्त करीब 300 लोगों के 600 हाथ दिन-रात तिरंगे को बनाने में जुटे हुए हैं.
यह परिवार अब तक सरकारी सप्लाई के लिए करीब 30 से 35 लाख तिरंगे तैयार कर चुका है. वहीं करीब 4 से 5 लाख तिरंगे रोजाना लोकल बाजार के लिए भेजे जा रहे हैं. हर दिन यहां कपड़े पर सिर्फ तीन रंग नहीं चढ़ रहे, बल्कि देश के सबसे सम्मानित प्रतीक को आकार दिया जा रहा है. सदर बाजार की इन गलियों में तिरंगे की सिलाई भले ही एक कारोबार हो, लेकिन इन कारीगरों के लिए ये सिर्फ कारोबार नहीं है. 1962 में गफ्फार भाई ने जिस काम की शुरुआत की थी, आज उनकी तीसरी पीढ़ी उसी परंपरा को आगे बढ़ा रही है.
छह महीने पहले शुरू हुई तैयारियां अब दिन-रात की मेहनत में बदल चुकी हैं, ताकि 15 अगस्त को देश के हर घर तक तिरंगा पहुंच सके. छोटे झंडे से लेकर बड़े राष्ट्रीय ध्वज तक हर आकार का तिरंगा यहां तैयार हो रहा है. मशीनों की आवाज के बीच लगातार चलती सिलाई और कारीगरों के हाथों की रफ्तार बताती है कि स्वतंत्रता दिवस की तैयारी कितनी बड़ी है. 1962 में गफ्फार भाई के हाथों से शुरू हुई तिरंगे की ये विरासत आज भी जिंदा बनी हुई है.
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Anoop Kumar Mishra is currently serving as Assistant Editor at News18 Hindi Digital, where he leads coverage of strategic domains including aviation, defence, paramilitary forces, international…
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