मोती बाग गांव से Gen-Z के अड्डे तक… 1973 के एक फैसले ने कैसे चमका दी किस्मत? जानें सत्य निकेतन की कहानी

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गांव से Gen-Z अड्‍डे तक… 1973 के फैसले ने कैसे चमकाई सत्य निकेतन की किस्मत?

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Satya Niketan History: कभी धूल उड़ाता गुमनाम मोती बाग गांव आज दिल्ली के युवाओं का अल्टीमेट अड्डा कैसे बन गया? 1973 में DU साउथ कैंपस की एंट्री ने पूरा सीन ही पलट दिया. 60-65 गज के मकान रातों-रात 5 मंजिला पीजी और कूल कैफे में तब्दील हो गए. लेकिन इस किलर वाइब के पीछे छुपा है अवैध निर्माण का वो खौफनाक सच जो आज सभी को परेशान कर रहा है.

रातों-रात लोगों की किस्‍मत पलट गई.

कभी सोचा है जिस सत्य निकेतन के कूल कैफे में बैठकर आज जेन जी शेक की चुस्कियां लेते हैं, उसकी नींव कब और कैसे डली. आज का यह अल्टीमेट ‘स्टूडेंट हब’ कभी सिर्फ धूल उड़ाता एक गुमनाम सा मोती बाग गांव हुआ करता था. फिर आया साल 1973 और DU साउथ कैंपस की धमाकेदार एंट्री ने पूरा सीन ही पलट कर रख दिया. वेंकी और एआरएसडी जैसे कॉलेजों के खुलते ही युवाओं का ऐसा सैलाब उमड़ा कि शांत रिहायशी इलाका रातों-रात हॉस्टल, पीजी और चिल-आउट जोन में बदल गया. 60 से 65 गज के छोटे मकान 5-5 मंजिला इमारतों में तब्दील हो गए और गलियां पास्ता, मोमोज और नाइटो-लाइफ के अड्डों से महकने लगीं. लेकिन 50 सालों के इस लंबे सफर में सस्ते कमरों और कैफे वाइब्स के पीछे बेतहाशा अवैध निर्माण की वो खतरनाक नींव भी खुदती गई जो आज रह-रहकर दिल्ली को दहला देती है.
सत्य निकेतन की शुरुआत: मोती बाग गांव का हिस्सा

• मूल पहचान: आज जिसे सत्य निकेतन कहा जाता है, वह मूल रूप से पुराना मोती बाग गांव (Moti Bagh Village) का हिस्सा हुआ करता था. 1950 और 60 के दशक तक यह इलाका काफी हद तक कृषि भूमि और ग्रामीण आबादी वाला क्षेत्र था.
• शरणार्थियों की बसावट और नामकरण: आजादी के बाद (1947) और 1960 के दशक में दिल्ली के शहरी विस्तार के तहत यहां कई परिवारों और विस्थापितों को ज़मीनें/प्लॉट आवंटित किए गए. धीरे-धीरे इस रिहायशी कॉलोनी का नाम ‘सत्य निकेतन’ पड़ा.

असली टर्निंग पॉइंट: DU साउथ कैंपस की स्थापना (1973)
सत्य निकेतन का असली कायाकल्प 1973 में हुआ, जब दिल्ली विश्वविद्यालय ने साउथ कैंपस (South Campus) की स्थापना की.
• कॉलेजों की एंट्री: बेनिटो हुआरेज़ मार्ग (Benito Juarez Marg) पर वेंकटेश्वर कॉलेज (Sri Venkateswara College), एआरएसडी (ARSD College), मोतीलाल नेहरू कॉलेज और जीसस एंड मैरी (JMC) जैसे नामी कॉलेज खुले.
• स्टूडेंट्स की पहली पसंद: जैसे-जैसे देश भर से छात्र साउथ कैंपस आने लगे, सड़क के ठीक पार स्थित सत्य निकेतन उनके रहने और खाने-पीने का सबसे पहला और सस्ता जरिया बन गया.

कमर्शियल हब और पीजी (PG) कल्चर का जन्म
• सिंगल स्टोरी से मल्टी-स्टोरी इमारतों में बदलाव: 1980 और 1990 के दशक में स्थानीय निवासियों ने छात्रों की बढ़ती मांग को देखते हुए अपने छोटे-छोटे 1-2 मंजिला मकानों को 4-5 मंजिला इमारतों और हॉस्टल्स/पीजी (PGs) में बदलना शुरू कर दिया.
• फूड एंड कैफे कल्चर: 2000 के बाद सत्य निकेतन दिल्ली का ‘कैफे हब’ बन गया. यहाँ किफायती दामों पर मिलने वाले पास्ता, मोमोज, शेक्स और चाइनीज कैफे पूरे साउथ कैंपस के स्टूडेंट्स के लिए अड्डा बन गए.

अवैध निर्माण और सुरक्षा से जुड़ा काला सच
सत्य निकेतन के इस तेजी से हुए व्यावसायिक विकास (Commercialization) का एक काला पहलू भी रहा:
• तंग गलियां और बिना नक्शे की इमारतें: 100 से 200 गज के छोटे-छोटे प्लॉटों पर ज्यादा से ज्यादा कमरे निकालने के चक्कर में बिना मजबूत नींव और बिना नगर निगम (MCD) के नक्शे पास कराए 4 से 5 मंजिला इमारतें खड़ी कर दी गईं.
• मापदंडों की अनदेखी: सेफ्टी नॉर्म्स, फायर सेफ्टी और स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी को दरकिनार कर अवैध निर्माण किया गया, जिसके चलते हाल ही में यहाँ पुरानी जर्जर इमारतों के ढहने जैसे दर्दनाक हादसे सामने आए हैं.

सवाल-जवाब
[q]कभी सोचा है जिस सत्य निकेतन के कूल कैफे में आप शेक की चुस्कियां लेते हैं, उसकी नींव में कितना बड़ा ड्रामा छिपा है?[/q]
[ans]आज का यह अल्टीमेट ‘जेन-जी स्टूडेंट हब’ कभी सिर्फ धूल उड़ाता एक गुमनाम सा मोती बाग गांव हुआ करता था! फिर आया साल 1973 और DU साउथ कैंपस की धमाकेदार एंट्री ने सब कुछ पलट कर रख दिया. वेंकी और एआरएसडी जैसे कॉलेजों के खुलते ही युवाओं का ऐसा सैलाब उमड़ा कि शांत खेती वाली जमीन रातों-रात हॉस्टल, पीजी और चिल-आउट जोन में बदल गई.

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Sandeep GuptaChief Sub Editor

पत्रकारिता में 16 वर्षों से अधिक का सुदीर्घ अनुभव रखने वाले संदीप गुप्ता वर्तमान में News18 इंडिया में बतौर चीफ सब-एडिटर होम पेज पर जिम्‍मेदारी संभाल रहे हैं. जटिल और सामरिक विषयों को बेहद सरल भाषा में पाठकों त…

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