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DUSU चुनाव के हालिया नतीजों ने राजधानी की छात्र राजनीति में राष्ट्रवाद की लहर पर एक बार फिर मुहर लगा दी है. आरएसएस और बीजेपी समर्थित ABVP ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस समर्थित NSUI को चारों खाने चित कर दिया. एबीवीपी ने केंद्रीय पैनल के चार प्रमुख पदों में से अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव समेत तीन सीटों पर बंपर जीत दर्ज की है.
स्टडी में बताया गया है कि डूसू चुनाव में सीजेपी का कोई असर नहीं दिखा. (पीटीआई)
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव के ताजा नतीजों पर सामने आई एक नई एनालिसिस रिपोर्ट ने राजधानी के छात्र राजनीति समीकरणों को साफ कर दिया है. ‘दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन इलेक्शन कंपेरेटिव स्टडी 2023 से 2026’ शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक, जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और अभिजीत दीपके के नेतृत्व वाले आक्रामक आंदोलन का छात्रों पर कोई खास असर नहीं दिखा. डीयू के सामान्य छात्रों ने वामपंथी विचारधारा के नैरेटिव को सिरे से खारिज करते हुए राष्ट्रवाद और ‘इंडिया-फर्स्ट’ की सोच के साथ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) पर अपना मजबूत भरोसा कायम रखा है.
रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला खुलासा वामपंथी गठबंधन के जमीनी समर्थन को लेकर हुआ है. आइसा और एसएफआई (AISA-SFI) का संयुक्त गठबंधन सड़कों पर जोरदार मौजूदगी दिखाने के बावजूद उसे ईवीएम में वोटों में तब्दील करने में बुरी तरह नाकाम रहा. साल 2026 के चुनावी आंकड़ों के अनुसार, इस पूरे वाम गठबंधन का कुल वोट शेयर सिमटकर महज 9.18 फीसदी रह गया. आलम यह रहा कि गठबंधन के दो उम्मीदवारों को तो नोटा (NOTA) से भी कम वोट मिले, जो दिखाता है कि कैंपस की नई पीढ़ी अब पुराने वामपंथी नारों से पूरी तरह किनारा कर चुकी है.
सड़क पर शोर, लेकिन बैलेट बॉक्स में सन्नाटा
विश्लेषण में सामने आया है कि सोशल मीडिया और धरने-प्रदर्शनों का माहौल चुनावी नतीजों से पूरी तरह जुदा रहा. सीजेपी और जेन-जी मोबिलाइजेशन में खुलकर शामिल होने के बाद भी लेफ्ट गठबंधन 10 फीसदी का आंकड़ा भी नहीं छू सका और 9.18% पर अटक गया. गठबंधन के दो उम्मीदवारों की स्थिति इतनी कमजोर रही कि छात्रों ने उन्हें चुनने के बजाय ‘इनमें से कोई नहीं’ (नोटा) का बटन दबाना ज्यादा मुनासिब समझा.
राष्ट्रवादी सोच पर छात्रों की मुहर
अध्ययन बताता है कि 2023 से 2026 के बीच डीयू के छात्रों का रुख पूरी तरह विकास और राष्ट्र-प्रथम के एजेंडे की तरफ झुका रहा. कैंपस ने यह संदेश दिया है कि बाहरी राजनीतिक आंदोलनों और पुराने पड़ चुके वामपंथी सिद्धांतों के मुकाबले छात्र अपने प्रतिनिधि के रूप में सकारात्मक और राष्ट्रहित से जुड़े छात्र संगठन को ही प्राथमिकता दे रहे हैं.
स्टडी में कहा गया है, “पिछले तीन सालों में लेफ्ट न तो सेंट्रल-पैनल की कोई सीट जीत पाया है और न ही 12 प्रतिशत से ज़्यादा वोट हासिल कर पाया है. इससे पता चलता है कि DU के छात्र इसे एक भरोसेमंद विकल्प के बजाय एक हाशिए पर पड़ी और विचारधारा के स्तर पर कमज़ोर ताकत मानते हैं, भले ही इसने बहुत सारे आंदोलन किए हों.”
स्टडी में कहा गया है कि DUSU चुनावों में वोटिंग का प्रतिशत चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और उसमें आने वाली रुकावटों से बहुत ज़्यादा प्रभावित होता है. “2024-25 में वोटिंग प्रतिशत में भारी गिरावट (34.7 प्रतिशत) तब देखी गई जब कैंपेन के दौरान तोड़-फोड़ या गंदगी फैलाने की शिकायतों के कारण कोर्ट के आदेश से नतीजों की घोषणा में लगभग दो महीने की देरी हुई; बाद के दो सालों में जब तोड़-फोड़ रोकने वाले नियमों को सख्ती से लागू किया गया, तो वोटिंग प्रतिशत में सुधार हुआ.”
हाल ही में हुए DUSU चुनावों में, RSS और BJP समर्थित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने कांग्रेस समर्थित नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ़ इंडिया (NSUI) को DUSU के चार पदों – अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव – में से तीन पर हराया. उपाध्यक्ष का पद एक निर्दलीय उम्मीदवार ने जीता. ABVP के नेता यश डबास ने अध्यक्ष का पद जीता, रिया छावड़ी ने सचिव का पद जीता और लक्ष्य राज सिंह ने संयुक्त सचिव का पद जीता. निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शोकीन ने उपाध्यक्ष का पद जीता.
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राकेश रंजन कुमार को डिजिटल पत्रकारिता में 10 साल से अधिक का अनुभव है. न्यूज़18 के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने लाइव हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज़, जनसत्ता और दैनिक भास्कर में काम किया है. वर्तमान में वह h…
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