दिल्ली. हर महीने सैलरी आते ही अगर यह सोचकर खर्च शुरू कर देते हैं कि जो पैसा आखिर में बचेगा, उसे सेव कर लेंगे, तो हो सकता है महीने के अंत तक बचत के लिए कुछ खास बचे ही नहीं. शॉपिंग, बाहर खाना, घूमना-फिरना और छोटी-छोटी जरूरतों के बीच पैसा कब खत्म हो जाता है, पता ही नहीं चलता. ऐसे में जापान का काकेइबो मेथड खर्च को समझने और बचत को पहले तय करने का एक तरीका बताता है. इस बारे में इकोनॉमिस्ट आकाश जिंदल ने बताया कि इसे घर के बजट में किस तरह अपनाया जा सकता है.
पहले बचत तय करें, फिर खर्च का बजट बनाएं
इकोनॉमिस्ट आकाश जिंदल के मुताबिक आमतौर पर लोग पहले खर्च करते हैं और आखिर में देखते हैं कि कितना पैसा बचा. मान लीजिए आपकी महीने की कमाई 50 हजार रुपये है. आप पूरे महीने खर्च करते रहे और आखिर में कभी 2 हजार, कभी 100 रुपये तो कभी 5 हजार रुपये बच गए. इस तरीके में बचत पहले से तय नहीं होती.
काकेइबो में इसका तरीका थोड़ा अलग है. अगर आपकी कमाई 50 हजार रुपये है और आपने तय किया कि हर महीने 15 हजार रुपये बचाने हैं, तो कमाई आते ही 15 हजार रुपये अलग कर दें. अब आपके पास खर्च के लिए 35 हजार रुपये हैं और पूरे महीने का बजट इसी रकम के अंदर चलाना है.
50 हजार की कमाई में 15 हजार की बचत का लक्ष्य
इस तरीके को आसान भाषा में समझें तो इसका फॉर्मूला है पहले बचत, फिर खर्च यानी 50 हजार रुपये कमाए तो पहले अपनी तय बचत अलग कर दी और बाकी 35 हजार रुपये से घर का खर्च चलाया. काकेइबो का एक अहम हिस्सा यही सोच है कि बचत को महीने के अंत में बची हुई रकम न मानकर पहले से तय किया जाए. इससे आपको हर खर्च करने से पहले यह पता रहेगा कि आपके पास वास्तव में कितना पैसा उपलब्ध है.
शॉपिंग और बाहर खाने में ऐसे बिगड़ता है बजट
अक्सर बजट बड़े खर्चों से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी खरीदारी से बिगड़ता है. मान लीजिए आप 2 हजार रुपये की टी-शर्ट लेने बाजार गए थे. वहां आपको 3 हजार या 3500 रुपये की टी-शर्ट पसंद आ गई. अगर आपके पास पैसे हैं तो आप सोच सकते हैं कि थोड़ा ज्यादा खर्च कर लेते हैं.
इसी तरह दोस्तों के साथ बाहर जाना, महंगे रेस्टोरेंट में खाना या सिर्फ इसलिए कोई चीज खरीद लेना क्योंकि आसपास के लोग भी खरीद रहे हैं, आपके महीने के बजट को प्रभावित कर सकता है. काकेइबो का मकसद ऐसे खर्चों पर रोक लगाने से ज्यादा आपको अपने खर्च को लेकर जागरूक करना है. इस तरीके में खर्च को लिखकर और देखकर यह समझने की कोशिश की जाती है कि पैसा आखिर जा कहां रहा है.
परिवार में भी बन सकता है पैसों का अनुशासन
इकोनॉमिस्ट आकाश जिंदल बताते हैं कि जब घर में पहले से तय होता है कि कितनी रकम बचानी है, तो परिवार के सदस्यों के बीच भी एक तरह का आर्थिक अनुशासन बनता है. अगर 50 हजार रुपये घर में आए हैं और परिवार ने तय कर लिया कि 15 हजार रुपये बचाने हैं, तो बाकी 35 हजार रुपये में ही महीने का बजट बनाना होगा. धीरे-धीरे यह आदत परिवार में पैसों को लेकर अनुशासन पैदा कर सकती है.
क्या भारत में भी अपनाया जाता है ऐसा तरीका
काकेइबो नाम भले ही जापानी है, लेकिन भारत में भी कई परिवार अपनी कमाई का एक हिस्सा पहले अलग करके बचत करते हैं. फर्क इतना है कि हर कोई इसे काकेइबो के नाम से नहीं जानता. यानी तरीका नया लग सकता है, लेकिन इसकी सोच कई भारतीय परिवारों में पहले से देखने को मिलती है. खास बात यह है कि यहां बचत को अगर पैसा बचा तो कर लेंगे की बजाय पहले से तय किया जाता है.
बचत सिर्फ पैसा अलग रखने का नाम नहीं
काकेइबो का एक जरूरी पहलू यह भी है कि व्यक्ति अपने खर्च को समझे और महीने के अंत में पीछे मुड़कर देखे कि पैसा कहां खर्च हुआ. इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि कौन से खर्च जरूरी थे और किन खर्चों को कम किया जा सकता था. साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि जो पैसे महीने की शुरुआत में बचाए थे, वे अंत तक निकालकर खर्च न कर दें.
