अगर खोलना चाहते हैं खुद का मेडिकल स्टोर, तो इन दस्तावेजों को रखें तैयार, जानें लाइसेंस से जुड़े सारे नियम

गाजियाबाद: अगर आप मेडिकल स्टोर खोलकर दवाइयों का कारोबार शुरू करने की सोच रहे हैं तो शुरुआत करने से पहले इससे जुड़ी हर जरूरी जानकारी समझना जरूरी है. मेडिकल स्टोर खोलने के लिए सिर्फ दुकान और उसमें दवाइयां रखना ही काफी नहीं होता. इसके लिए जरूरी लाइसेंस, रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट, दुकान की जगह, दस्तावेज, शुरुआती बजट, दवाओं की खरीद और स्टॉक के साथ-साथ एक्सपायरी दवाओं का भी पूरा हिसाब रखना पड़ता है. गाजियाबाद के मेडिकल स्टोर संचालक जीवेश भटनागर से जानिए कि इस कारोबार में सबसे पहली जरूरत दवाइयों की सही जानकारी और अनुभव की है.

अगर कोई व्यक्ति खुद फार्मासिस्ट के तौर पर काम करना चाहता है तो उसके पास डी.फार्मा या बी.फार्मा जैसी मान्य योग्यता और फार्मेसी काउंसिल का रजिस्ट्रेशन होना चाहिए. हालांकि दुकान का मालिक खुद फार्मासिस्ट न हो तो नियमों के अनुसार रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट की नियुक्ति करके भी मेडिकल स्टोर चलाया जा सकता है.

लाइसेंस के लिए इन दस्तावेजों की जरूरत
इसके बाद सबसे अहम कदम दवा बिक्री का लाइसेंस लेना है. इसके लिए संबंधित राज्य के ड्रग कंट्रोल विभाग में आवेदन करना होता है. आवेदन के दौरान दुकान के मालिकाना हक या किराये से जुड़े दस्तावेज, दुकान के पते का प्रमाण, आवेदक के पहचान और पते से जुड़े कागज, दुकान का नक्शा या लेआउट और फार्मासिस्ट की शैक्षणिक योग्यता और रजिस्ट्रेशन से संबंधित दस्तावेज तैयार रखने होते हैं. आवेदन पूरा होने के बाद विभाग की ओर से जरूरी जांच या दुकान का निरीक्षण किया जा सकता है. इसलिए आवेदन से पहले दुकान को निर्धारित नियमों के अनुसार तैयार करना जरूरी है.

लाइसेंस मिलने के बाद भी जिम्मेदारी खत्म नहीं होती लाइसेंस जिस श्रेणी और शर्तों के तहत जारी हुआ है उसी के अनुसार दवाओं की बिक्री करनी होती है. लाइसेंस और जरूरी प्रमाणपत्र सुरक्षित रखने के साथ खरीद-बिक्री का रिकॉर्ड भी व्यवस्थित रखना होता है. लाइसेंस की वैधता और नवीनीकरण से जुड़ी जरूरतों पर भी नजर रखनी चाहिए.

यहां होनी चाहिए दुकान
उन्होंने कहा कि दुकान की जगह चुनते समय भी जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए. सामान्य रिटेल दवा बिक्री के लिए नियमों में कम से कम 11 वर्ग मीटर यानी करीब 120 वर्ग फुट जगह का प्रावधान है. दुकान ऐसी जगह हो जहां ग्राहकों की आवाजाही हो और आसपास डॉक्टर, क्लीनिक या अस्पताल हों तो कारोबार में मदद मिल सकती है. दुकान में पर्याप्त रैक, बिलिंग काउंटर और तापमान नियंत्रित रखने वाली दवाओं के लिए उचित फ्रिज की व्यवस्था करनी होगी.

शुरुआती बजट करीब 2.5 से 3 लाख रुपये रखा जा सकता है, लेकिन पूरी रकम सिर्फ दवाओं में लगाना सही नहीं होगा. इसमें दुकान की सिक्योरिटी और शुरुआती किराया, रैक-काउंटर व फर्नीचर, कंप्यूटर-बिलिंग सिस्टम, फ्रिज, साइन बोर्ड, शुरुआती दवा स्टॉक और फार्मासिस्ट या कर्मचारी की शुरुआती सैलरी शामिल होगी. कुछ रकम बिजली-पानी और दूसरे रोजमर्रा के खर्च के लिए बचाकर रखना भी जरूरी है, ताकि दुकान शुरू होते ही पैसों की कमी न पड़े.

जरूरत से ज्यादा दुकान पर ना रखें माल
मेडिकल स्टोर संचालक जीवेश ने कहा कि दवाओं का स्टॉक खरीदना इस कारोबार का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. माल रजिस्टर्ड स्टॉकिस्ट या अधिकृत थोक विक्रेता से बिल के साथ लेना चाहिए. खरीदते समय दवा का बैच नंबर, एक्सपायरी डेट, पैकिंग और बिल जरूर जांचना चाहिए. शुरुआत में हर तरह की दवा का भारी स्टॉक रखने के बजाय इलाके में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली दवाओं से शुरुआत करना बेहतर है.

जरूरत से ज्यादा माल रखने पर पैसा स्टॉक में फंस सकता है और एक्सपायरी होने के बाद कुछ दवाएं वापस नहीं हो पातीं. इसके लिए स्टॉक का नियमित रिकॉर्ड रखना और जो दवा पहले एक्सपायर होने वाली है उसे पहले बिक्री में रखना जरूरी है. सप्लायर से माल लेते समय एक्सपायरी दवाओं की वापसी की शर्त भी पहले समझ लेनी चाहिए.

बिक्री में प्रिस्क्रिप्शन के नियमों का पालन जरूरी 
मेडिकल स्टोर संचालक ने कहा कि दवाओं की बिक्री में प्रिस्क्रिप्शन के नियमों का पालन भी जरूरी है. हर दवा ग्राहक की मांग पर नहीं दी जा सकती. कुछ दवाएं डॉक्टर के पर्चे के आधार पर ही बेची जाती हैं और कुछ विशेष श्रेणी की दवाओं के लिए अतिरिक्त रिकॉर्ड रखने के नियम होते हैं, इसलिए फार्मासिस्ट को दवाओं की श्रेणी और बिक्री से जुड़े नियमों की जानकारी होनी चाहिए.

इसी तरह सभी दवाओं को एक ही तरीके से रखना सही नहीं है. कुछ दवाओं को निर्धारित तापमान पर रखने की जरूरत होती है, इसलिए फ्रिज और स्टोरेज की व्यवस्था सही होनी चाहिए. दुकान को धूप, गर्मी और नमी से बचाने के साथ रैक की सफाई का भी ध्यान रखना होगा.

अलग-अलग दवाओं पर मार्जिन अलग
मुनाफे की बात करें तो अलग-अलग दवाओं पर मार्जिन अलग होता है. जीवेश भटनागर के अनुसार, औसतन 22 से 25 प्रतिशत तक ग्रॉस मार्जिन मिल सकता है, लेकिन इसे सीधे शुद्ध मुनाफा नहीं माना जा सकता. किराया, बिजली, फार्मासिस्ट या कर्मचारी की सैलरी, खराब या एक्सपायर स्टॉक और दूसरे खर्च निकालने के बाद वास्तविक कमाई तय होती है. इसके अलावा ऑनलाइन दवा कंपनियों के डिस्काउंट और आसपास बढ़ती मेडिकल दुकानों की संख्या से प्रतिस्पर्धा भी लगातार बढ़ रही है.

कारोबार शुरू करने वाले व्यक्ति को GST और अन्य स्थानीय कारोबारी रजिस्ट्रेशन की जरूरत भी अपने कारोबार की स्थिति के अनुसार जांचनी चाहिए. ऐसे में मेडिकल स्टोर शुरू करने से पहले दवाओं की जानकारी, बाजार की समझ, सही स्टॉक, भरोसेमंद सप्लायर, व्यवस्थित रिकॉर्ड और नियमों का पालन इन सभी बातों को समझना जरूरी है. यही तैयारी कारोबार को शुरुआत में होने वाली बड़ी गलतियों और आर्थिक नुकसान से बचा सकती है.

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *