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Rice Crop Disease Prevention Tips: बदलते मौसम के कारण धान की बाली पर बैक्टीरियल पैनिकल ब्लाइट का नया खतरा मंडरा रहा है, जिससे उपज में भारी गिरावट आ सकती है. डॉ. एस. के. सिंह ने किसानों को इस रोग से बचाव के उपाय बताए हैं, जिसमें प्रमाणित बीज, जल निकासी और यूरिया का कम उपयोग शामिल है.
दरभंगा: धान भारत की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार है. लेकिन बदलते मौसम, बढ़ते तापमान और अनियमित बारिश के कारण धान में नए रोगों का खतरा बढ़ रहा है. ऐसी ही एक नई चुनौती है बैक्टीरियल पैनिकल ब्लाइट. इस पर जानकारी दे रहे हैं डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी के प्रोफेसर (डॉ.) एसके सिंह. डॉ. सिंह बताते हैं कि यह रोग धान की बाली और दानों को सीधे प्रभावित करता है. जिससे दाना भरता ही नहीं है. उपज में भारी गिरावट आ जाती है. यह रोग मुख्य रूप से Burkholderia glumae नामक जीवाणु से होता है. यह गर्म और नम वातावरण में तेजी से फैलता है.
कैसे पहचानें इस रोग को?
इस रोग के लक्षण फूल आने और दाना बनने की अवस्था में दिखते हैं. संक्रमित बालियों में दाने पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाते, दाने हल्के, सिकुड़े और भूरे रंग के हो जाते हैं. पूरी बाली झुलसी हुई दिखाई देती है और बाँझपन बढ़ जाता है. कई बार पौधे की पत्ती की म्यान में भूरापन भी दिखता है. इसके लक्षण अक्सर फफूंद रोग जैसे लगते हैं, जिससे पहचान मुश्किल हो जाती है.
क्यों बढ़ रहा है बिहार में खतरा?
यह जीवाणु Toxoflavin नामक जहर बनाता है जो पौधे की कोशिकाओं को मार देता है. इसका प्रसार संक्रमित बीज, बारिश और सिंचाई के पानी से होता है. 30 डिग्री से अधिक तापमान और 80 प्रतिशत से अधिक नमी इसके लिए सबसे अनुकूल है. बिहार, झारखंड और बंगाल में खरीफ में यही मौसम रहता है। खेतों में लंबे समय तक नमी रहने से इस रोग का खतरा और बढ़ जाता है. कई शोधों में इससे 5 से 75 प्रतिशत तक उपज हानि दर्ज की गई है.
जानें बचाव के उपाय
खेती में सुधार के लिए हमेशा प्रमाणित और रोगमुक्त बीज का प्रयोग करें. बीज उपचार जरूर करें. खेत में जल निकासी रखें और यूरिया का अधिक प्रयोग न करें. फसल चक्र अपनाएं और संक्रमित पौधों को खेत में न छोड़ें. जैविक नियंत्रण में Bacillus subtilis, Pseudomonas fluorescens जैसे लाभकारी जीवाणु इस रोग को रोकने में मददगार हैं. रासायनिक नियंत्रण में कॉपर आधारित दवाएं कुछ हद तक रोकथाम कर सकती हैं. एंटीबायोटिक का प्रयोग बिना विशेषज्ञ सलाह के न करें. किसानों को सलाह है कि फूल आने के समय खेत की नियमित निगरानी करें और कोई भी संदिग्ध लक्षण दिखने पर तुरंत कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विश्वविद्यालय से संपर्क करें.
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अमित रंजन वर्तमान में News18 में बिहार, झारखंड और दिल्ली से जुड़ी खबरों के समन्वय और संपादन का कार्य देख रहे हैं. खोजी पत्रकारिता उनकी विशेष रुचि का क्षेत्र है. राजनीति, शिक्षा, खेल, क्राईम और मौसम जैसे विषयों …
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