नई दिल्ली. दिल्ली हाईकोर्ट में गुरुवार यानी 22 अक्टूबर को ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की नेशनल प्रेसिडेंट नेहा बोरा से जुड़े मामले पर करीब ढाई घंटे से ज्यादा सुनवाई हुई. मामला 16 अक्टूबर को हुए ‘लहरा दो तिरंगा’ प्रदर्शन के बाद शांति बनाए रखने के लिए 10000 रुपये का निजी मुचलका और एक जमानतदार देने के नोटिस से जुड़ा है. नेहा बोरा ने बहस के दौरान एक ऐसी दलील दी जिससे कोर्टरूम में कई लोग हैरान रह गए. नेहा ने दलीलों के दौरान अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास की कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) से खुद को अलग कर लिया.
नेहा बोरा ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (एसईएम) की ओर से जारी इस नोटिस को चुनौती दी है. उनका कहना है कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और उन्होंने किसी तरह की हिंसा का आह्वान नहीं किया था. उनकी तरफ से यह भी दलील दी गई कि वह कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के उस अलग प्रदर्शन में शामिल नहीं थीं जिसमें कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में राष्ट्रीय ध्वज फहराने का ऐलान किया गया था. जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया. अदालत ने कहा कि आदेश शुक्रवार शाम 6 बजे सुनाया जाएगा.
नेहा बोरा ने कोर्ट में क्या कहा?
नेहा बोरा की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत में पक्ष रखा. उन्होंने कहा कि बोरा आइसा की नेता हैं और उन्होंने 16 अक्टूबर को एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन का आह्वान किया था. उनके मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान नेहा ने हिंसा करने या शांति भंग करने की अपील नहीं की थी. वकील ने बताया कि नेहा बोरा जब 16 अक्टूबर की शाम मंडी हाउस पहुंचीं तो करीब 10 से 15 मिनट बाद उन्हें हिरासत में ले लिया गया. उनका दावा था कि उस समय उनके खिलाफ किसी अपराध का आरोप नहीं लगाया गया था.
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि हिरासत में लेने के बाद नेहा को तुरंत अपने परिवार और वकीलों से बात करने की अनुमति नहीं दी गई. उनके वकील ने इस कार्रवाई को गैरकानूनी बताते हुए सवाल उठाया कि क्या शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने का नोटिस जारी करने से पहले जरूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया था.
‘मैं CJP के प्रदर्शन में शामिल नहीं थी’, अलग प्रदर्शन का मुद्दा क्यों उठा?
सुनवाई के दौरान नेहा बोरा की ओर से यह दलील दी गई कि उनका प्रदर्शन सीजेपी के कार्यक्रम से अलग था. सीजेपी ने कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में राष्ट्रीय ध्वज फहराने का ऐलान किया था जबकि नेहा बोरा 16 अक्टूबर के ‘लहरा दो तिरंगा’ प्रदर्शन से जुड़ी थीं. दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) चेतन शर्मा ने इस दलील पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर और उसके आसपास के इलाके में चार या उससे ज्यादा लोगों के इक्ट्ठा होने पर रो लगी थी. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिश की थी.
पुलिस के मुताबिक, नेहा बोरा को रोका गया था और उस समय वहां बैरिकेडिंग भी की गई थी. एएसजी ने यह भी दावा किया कि नेहा बोरा का यह कहना कि वह दूसरे संगठन के प्रदर्शन से अलग थीं, सही नहीं है. हालांकि, यह दोनों पक्षों की दलीलें हैं. इस मुद्दे पर अदालत का अंतिम फैसला आना बाकी है.
SEM के नोटिस को क्यों चुनौती दे रही हैं नेहा बोरा?
नेहा बोरा ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से 17 अक्टूबर को जारी नोटिस को चुनौती दी है. यह नोटिस भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की संबंधित धाराओं के तहत जारी किया गया था. धारा 126 के तहत मजिस्ट्रेट को ऐसी स्थिति में शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड की मांग करने की प्रक्रिया शुरू करने का अधिकार है, जब उन्हें जानकारी मिले कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है. धारा 130 में कारण बताने से जुड़े लिखित आदेश का प्रावधान है, जबकि धारा 135 में जांच के दौरान कुछ परिस्थितियों में बॉन्ड भरने या हिरासत से जुड़े आदेश दिए जा सकते हैं. नेहा बोरा के वकील का कहना था कि नोटिस जारी करने से पहले पर्याप्त शुरुआती जांच नहीं की गई. उन्होंने दलील दी कि जिस जानकारी के आधार पर कार्रवाई की गई, वह भरोसेमंद नहीं थी और नोटिस बिना पर्याप्त विचार के जारी किया गया. बचाव पक्ष के मुताबिक, किसी व्यक्ति को शांति भंग करने की आशंका के आधार पर कार्रवाई का सामना करना पड़ता है, तो उससे जुड़ी कानूनी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है.
हाईकोर्ट ने पुलिस से क्या सवाल पूछा?
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पुलिस की दलीलों पर कई सवाल उठाए. अदालत ने पूछा कि अगर किसी व्यक्ति के बारे में मजिस्ट्रेट को सूचना मिलती है कि वह किसी जगह नारे लगा रहा था, तो क्या मजिस्ट्रेट को यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि सूचना भरोसेमंद है? अदालत ने यह भी जानना चाहा कि जांच और कारण बताओ नोटिस पर सुनवाई के दौरान संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने के लिए जरूरी दस्तावेज दिए जाते हैं या नहीं.
कोर्ट ने स्वतंत्रता के अधिकार का मुद्दा उठाते हुए कहा कि जब किसी व्यक्ति की आजादी पर रोक लगाने की कार्रवाई होती है, तो कानूनी प्रक्रिया का पालन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है. अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 का भी उल्लेख किया, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा से जुड़ा है. कोर्ट की चिंता यह थी कि किसी व्यक्ति को पहले ही ऐसा मान लेना कि वह शांति भंग कर सकता है, उसके लिए एक तरह का कलंक बन सकता है. इसलिए ऐसी कार्रवाई में प्रक्रिया की वैधता की जांच जरूरी है.
दिल्ली पुलिस ने अपने बचाव में क्या दलील दी?
दिल्ली पुलिस की ओर से ASG चेतन शर्मा ने कहा कि मजिस्ट्रेट के पास कार्रवाई के लिए पर्याप्त आधार थे. उन्होंने जनरल डायरी में दर्ज जानकारी, पहले दर्ज एफआईआर और संबंधित घटनाओं का हवाला दिया. पुलिस की ओर से यह भी कहा गया कि नेहा बोरा के खिलाफ पहले से दर्ज मामलों और उस समय के हालात को ध्यान में रखकर कार्रवाई की गई थी. ASG ने कथित तौर पर छह FIR का उल्लेख करते हुए सवाल किया कि क्या इन रिकॉर्ड को नजरअंदाज किया जा सकता है. पुलिस का पक्ष था कि धारा 126 और धारा 130 के तहत शांति बनाए रखने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए मजिस्ट्रेट को मिली जानकारी और परिस्थितियों पर विचार करना होता है.
