पार्किंसंस डिजीज से महिलाओं की जिंदगी हो जाती है ज्यादा मुश्किल, नई स्टडी में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

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Parkinson’s Disease and Women: पार्किंसन एक न्यूरोलॉजिकल डिजीज है, जो बुजुर्गों को बुरी तरह प्रभावित करती है. एक रिसर्च में पता चला है कि पार्किंसंस डिजीज से महिलाओं की जिंदगी पुरुषों की तुलना में ज्यादा मुश्किल हो जाती है. इस बीमारी के कारण महिलाओं को रोज के कामकाज, रिश्तों और आत्मनिर्भरता में ज्यादा परेशानियां महसूस होती हैं.

पार्किंसंस डिजीज के कारण लोगों की जिंदगी बहुत मुश्किल हो जाती है.

Parkinson’s Impact on Women: पार्किंसंस डिजीज धीरे-धीरे बढ़ने वाली न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जो मुख्य रूप से शरीर की गति, संतुलन और मांसपेशियों के कंट्रोल को प्रभावित करती है. आमतौर पर 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को इसका खतरा ज्यादा होता है. इस बीमारी की वजह से लोगों की जिंदगी बुरी तरह प्रभावित होती है और वे अपने रोज के कामकाज भी नहीं कर पाते हैं. यह एक ऐसी बीमारी है, जो समय के साथ बिगड़ती जाती है. इस बीमारी का असर सिर्फ शरीर तक सीमित नहीं रहता है, बल्कि मरीज के मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक जीवन पर भी गहरा असर होता है. पुरुषों को पार्किंसंस डिजीज का खतरा ज्यादा होता है, लेकिन महिलाएं भी इसका शिकार होती हैं. अब एक रिसर्च में इसे लेकर चौंकाने वाली बात सामने आई है.

TOI की रिपोर्ट के मुताबिक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज की एक स्टडी में पाया गया कि महिलाओं पर पार्किंसंस डिजीज का सामाजिक और मनोवैज्ञानिक बोझ पुरुषों की तुलना में अधिक होता है. इस स्टडी में बताया गया कि पार्किंसंस के इलाज को केवल शारीरिक लक्षणों तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मरीजों के मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना जरूरी है. इस अध्ययन में 484 मरीजों को शामिल किया गया, जिनमें 330 पुरुष और 154 महिलाएं थीं. सभी प्रतिभागियों का मूल्यांकन SCOPA-PS स्केल के माध्यम से किया गया, जो रोजमर्रा की गतिविधियों, रिश्तों, भावनात्मक स्थिति और आत्मनिर्भरता जैसे पहलुओं को मापता है.

इस स्टडी के रिजल्ट से पता चला कि समान उम्र और सेम बीमारी के बावजूद महिलाओं को दैनिक जीवन में ज्यादा कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. महिलाएं घरेलू काम, शौक, मनोरंजन और सामाजिक संबंधों को निभाने में अधिक परेशानी महसूस करती हैं. वे खुद को अधिक निर्भर मानती हैं और अकेलेपन की भावना भी उनमें ज्यादा पाई गई. विशेषज्ञों का मानना है कि इसका कारण केवल बीमारी की गंभीरता नहीं, बल्कि सामाजिक भूमिकाएं और पारिवारिक अपेक्षाएं भी हैं, जो महिलाओं पर अधिक जिम्मेदारी डालती हैं.

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कुछ मानसिक और भावनात्मक चुनौतियां महिला और पुरुष दोनों में समान रूप से पाई गईं. भविष्य को लेकर चिंता, बातचीत में कठिनाई और शर्म की भावना दोनों में एक जैसी होती है. यह दर्शाता है कि पार्किंसंस केवल एक शारीरिक बीमारी नहीं है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य को भी गहराई से प्रभावित करती है. शोधकर्ताओं से सुझाव दिया है कि पार्किंसंस के इलाज में जेंडर-सेंसिटिव दृष्टिकोण अपनाना चाहिए. मरीजों को दवाओं के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक सहायता, काउंसलिंग और सामाजिक समर्थन की भी आवश्यकता होती है. इससे उनकी जीवन गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है और वे बीमारी के साथ बेहतर तरीके से जीवन जी सकते हैं.

इस बीच एक केस स्टडी में यह भी सामने आया कि एक महिला मरीज AI चैटबॉट पर अत्यधिक निर्भर हो गई थी, जिसे बाद में मानसिक स्थिति और दवाओं के प्रभाव से जोड़ा गया. इलाज और दवा में बदलाव के बाद उनकी स्थिति में सुधार हुआ. यह घटना यह भी दर्शाती है कि तकनीक का उपयोग सावधानी और सीमाओं के साथ करना जरूरी है. यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि पार्किंसंस रोग का प्रभाव सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक भी होता है और महिलाओं पर इसका असर अधिक गहरा देखा गया है.

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अमित उपाध्याय

अमित उपाध्याय News18 Hindi की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें

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