2500 रुपये के लिए हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया शख्स, फिर हुआ कुछ ऐसा, पलट गई तस्वीर

Supreme Court News: अक्सर अस्पतालों में ऐसे केसेज होते हैं जब बिलिंग को लेकर मरीज के परिजन और अस्पताल स्टाफ आपस में भिड़ जाते हैं और इस लड़ाई-झगड़े में बीच-बचाव भी कराना पड़ जाता है, हालांकि यहां ऐसा मामला सामने आया है जब एक शख्स एक साधारण बिलिंग गलती को पहले हाईकोर्ट में केस लड़ा और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया.

इस शख्स ने बिलिंग में लापरवाही को अस्पताल की गलती बताकर आपराधिक मुकदमा दायर किया था जो 12 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पामिडिगंतम श्रीनरसिम्हा और जस्टिस अलोक अराधे की बेंच के सामने पहुंचा. हालांकि इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने पूरा मामला ही पलट दिया और शख्स को जोरदार झटका दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में शख्स को झटका देते हुए पश्चिम बंगाल के नारायणा मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल बारासात को बड़ी राहत दी है.

दरअसल मामला 2021 का है जब एक बुजुर्ग महिला का फीमर हड्डी का ऑपरेशन नारायणा अस्पताल में हुआ. बेटे ने आरोप लगाया कि अस्पताल ने 2500 रुपये का HRCT (हाई-रेजोल्यूशन सीटी स्कैन) का बिल तो काट लिया, लेकिन टेस्ट कभी कराया ही नहीं गया. इसके अलावा मेडिकल रिकॉर्ड समय पर नहीं दिए गए और जब सवाल किए तो स्टाफ ने बदतमीजी और धमकी भी दी.

इन आरोपों पर मजिस्ट्रेट कोर्ट ने अस्पताल, उसके चेयरमैन और स्टाफ के खिलाफ IPC की धारा 406 (क्रिमिनल ब्रेक ऑफ ट्रस्ट), 420 (धोखाधड़ी) और 120B (आपराधिक साजिश) के तहत नोटिस जारी कर दिए. कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी प्रथम दृष्टया केस बनता दिखाया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तस्वीर उलट दी.

कोर्ट ने सख्ती से कहा – “धोखाधड़ी के लिए शुरुआत से ही बेईमानी का इरादा होना जरूरी है.” यहां ऐसा नहीं था. अस्पताल ने खुद माना कि टेस्ट अनावश्यक पाया गया, गलती पहचानते ही रिवाइज्ड बिल जारी किया और रिफंड का ऑफर भी दिया. कोर्ट ने इसे “inadvertence” (लापरवाही) करार दिया, न कि कोई फ्रॉड.

क्रिमिनल ब्रेक ऑफ ट्रस्ट के मामले में बेंच ने कहा कि अस्पताल का बिल एक व्यावसायिक लेन-देन है, न कि कोई ट्रस्ट. पैसे सौंपना ट्रस्ट नहीं बनाता. बिना मुख्य अपराध के साजिश का आरोप भी नहीं टिक सकता.

न्यायाधीशों ने साफ कहा, “शिकायत में दी गई सारी बातें सही मानकर भी कोई आपराधिक अपराध नहीं बनता.” रिकॉर्ड न देना या देर से देना अधिकतम सिविल दावा या वेस्ट बंगाल क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत शिकायत का आधार हो सकता है, लेकिन जेल भेजने लायक अपराध नहीं.

कोर्ट ने आपराधिक शिकायत को पूरी तरह खारिज कर दिया, लेकिन शिकायतकर्ता को सिविल या वैधानिक उपायों का पूरा अधिकार दिया.यह फैसला अस्पतालों के लिए राहत भरा है और मरीजों को याद दिलाता है कि हर बिलिंग गलती को आपराधिक साजिश नहीं माना जा सकता.

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