वह मंजर याद कीजिए जब घर का कोई सदस्य अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ जाता है. दिल्ली जैसे महानगर में किसी नामी प्राइवेट अस्पताल के आईसीयू (ICU) का दरवाजा खटखटाने का मतलब ही होता है बैंक खाते का पूरी तरह साफ हो जाना, जिंदगी भर की जमा-पूंजी दांव पर लग जाना, या फिर इलाज के भारी-भरकम बिल को चुकाने के लिए अपनी पुश्तैनी जमीन और मां-बहन के जेवर तक को कौड़ियों के भाव गिरवी रख देना. सफेद एप्रन पहने डॉक्टरों की गंभीर शक्लें और अस्पताल के काउंटर से हर घंटे थमाए जाने वाले हजारों-लाखों के बिल किसी भी हंसते-खेलते मध्यमवर्गीय या गरीब परिवार को जीते जी एक कभी न खत्म होने वाले कर्ज के दलदल में धकेल देते हैं. लेकिन जरा ठहरिए! दिल्ली के स्वास्थ्य गलियारों से एक ऐसा जादुई और नाटकीय आंकड़ा सामने आया है, जिसने कॉर्पोरेट अस्पतालों के इस खौफनाक कमर्शियल चक्रव्यूह को ताश के पत्तों की तरह बिखेर कर रख दिया है.
यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं बल्कि दिल्ली के 46,900 से अधिक लाचार और बेबस परिवारों की आंखों में आए सुकून के आंसुओं की वो कड़वी हकीकत है जिसे आयुष्मान भारत के एक क्रांतिकारी आर्थिक गणित ने पूरी तरह बदलकर रख दिया. जब सालभर का वित्तीय लेखा-जोखा तैयार हुआ तो पता चला कि अस्पतालों द्वारा भेजे गए 34,715 क्लेम को पास करने के लिए सरकार ने अपनी तिजोरी से ₹86.22 करोड़ की भारी-भरकम राशि तो चुकाई, लेकिन जब इसका प्रति मरीज औसतन हिसाब निकाला गया तो बड़े-बड़े विशेषज्ञ भी सन्न रह गए. जिस इलाज के लिए प्राइवेट अस्पताल आम जनता से लाखों रुपये वसूल लेते हैं, उसी इलाज को सरकार ने प्रति मरीज औसतन महज ₹24,260.40 के मामूली खर्च में पूरी तरह मुकम्मल कर दिया!
एक-एक जिंदगी की यह सरकारी कीमत दिल्ली के इतिहास में स्वास्थ्य क्रांति का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बन चुकी है. दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार की इस जुगलबंदी ने एक ऐसा ‘डबल कवर सुरक्षा कवच’ तैयार किया, जिसने मरीज की जेब पर लगने वाले डाके को हमेशा के लिए रोक दिया. अब न तो किसी बाप को अपने बेटे के इलाज के लिए सूदखोरों के आगे हाथ फैलाने पड़ रहे हैं, और न ही किसी मां को अपने गहने बेचने की नौबत आ रही है. दिल्ली के 181 टॉप प्राइवेट और 52 सरकारी अस्पतालों के कड़े और महंगे नियमों के बीच आम आदमी का यह ‘तारेक-ए-इलाज’ कैसे मुमकिन हुआ और आप भी इस ₹10 लाख के मुफ्त सुरक्षा चक्र का हिस्सा कैसे बन सकते हैं, आइए इस पूरे चमत्कार के पीछे का सटीक तरीका और पूरा गणित विस्तार से समझते हैं.
सवाल-जवाब
बिना जमीन या जेवर बेचे दिल्ली के 46,000 से अधिक लोगों ने बड़े अस्पतालों में इलाज कैसे करा लिया?
यह आयुष्मान भारत योजना के ‘कैशलेस’ मॉडल के कारण संभव हुआ. दिल्ली के पात्र नागरिकों को केंद्र और राज्य सरकार की ओर से ₹10 लाख तक का मुफ्त स्वास्थ्य बीमा मिलता है. अस्पताल का पूरा खर्च सरकार सीधे अपने फंड से चुकाती है, जिससे मरीज को अपनी जेब से ₹1 भी नहीं देना पड़ता.
दिल्ली में इस योजना के तहत इलाज का वह ‘मामूली खर्च’ क्या है जिसने सबको चौंका दिया है?
सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, कुल ₹86.22 करोड़ के दावों और 34,715 पास क्लेम के आधार पर, प्रति मरीज के इलाज पर सरकार को औसतन केवल ₹24,260.40 का खर्च उठाना पड़ा है, जो कि दिल्ली जैसे महंगे शहर के लिहाज से बेहद नियंत्रित और किफायती है.
क्या दिल्ली के नामी और बड़े प्राइवेट अस्पतालों में भी इस आयुष्मान कार्ड से पूरी तरह मुफ्त इलाज होता है?
हां, दिल्ली के 181 शीर्ष निजी अस्पताल और 52 सरकारी अस्पताल (कुल 233 अस्पताल) इस योजना के पैनल में शामिल हैं. इन अस्पतालों में भर्ती होने पर मरीज को दवाओं, डॉक्टरों की फीस और ऑपरेशन के लिए कोई भुगतान नहीं करना होता.
दिल्ली में मिलने वाले इस ₹10 लाख के ‘डबल कवर’ मुफ्त इलाज का तरीका क्या है?
दिल्ली में आयुष्मान भारत का एक विशेष मॉडल लागू है. इसमें शुरुआती ₹5 लाख तक का इलाज केंद्र सरकार की ‘AB PM-JAY’ योजना के बजट से होता है. यदि मरीज की बीमारी गंभीर है और खर्च ₹5 लाख से ऊपर जाता है, तो दिल्ली सरकार अपने बजट से अतिरिक्त ₹5 लाख का ‘टॉप-अप कवर’ देती है.
यदि कोई नागरिक दिल्ली में इस मुफ्त इलाज की योजना से जुड़ना चाहता है, तो उसकी क्या पात्रता होनी चाहिए?
इस योजना से जुड़ने के लिए नागरिक का नाम सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC) की पात्रता सूची में होना चाहिए या वह 70 वर्ष से अधिक आयु का वरिष्ठ नागरिक होना चाहिए, जिसके तहत ‘वय वंदना योजना’ (VVS) के माध्यम से मुफ्त आयुष्मान कार्ड बनाया जाता है.
