दिल्ली का अनोखा गुरुकुल…जहां इंग्लिश-कंप्यूटर के साथ होती है संस्कृत की पढ़ाई, यहां है 150 साल पुरानी गौशाला

नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली में जहां ज्यादातर माता-पिता अपने बच्चों को आधुनिक शिक्षा और इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ाने का सपना देखते हैं. यही नहीं, दिल्ली के ज्यादातर घरों में वेस्टर्न कल्चर अपनाया जाता है. वहीं, इसी दिल्ली में एक ऐसा गुरुकुल भी है. जो हजारों साल पुरानी भारतीय परंपरा को जीवित रखे हुए है. यहां पहुंचते ही ऐसा महसूस होता है कि मानो समय का पहिया पीछे घूम गया हो और आप कलयुग नहीं, बल्कि त्रेता युग में आ गए हैं. यहां चारों ओर गूंजते वैदिक मंत्र, सिर पर शिखा धारण किए छात्र, कड़े अनुशासन में जीवन जीते बच्चे और अपना हर काम स्वयं करने की परंपरा, यह गुरुकुल आधुनिकता के बीच भारतीय संस्कृति की एक अनोखी मिसाल बनकर उभर रहा है.

आइये जानतै हैं कि आखिर क्यों माता-पिता अपने बच्चों को यहां भेज रहे हैं और कैसी है यहां की दिनचर्या. यही जानने के लिए यहां के आचार्य किशन त्रिपाठी से लोकल 18 की टीम ने बातचीत की. उन्होंने बताया कि यह गुरुकुल 4 साल पुराना है और यहां कि जो गौशाला है. वह 150 साल पुरानी है. उन्होंने बताया कि इस गुरुकुल का संचालन दिल्ली पिंजरापोल समिति करती है. इस गुरुकुल का नाम लाला उमराव सिंह बराठी संस्कृत वैदिक गुरुकुल है.

नि:शुल्क है यह पूरा गुरुकुल

आचार्य किशन त्रिपाठी ने बताया कि यह गुरुकुल पूरी तरह से निशुल्क है. यहां पर मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, झारखंड और राजस्थान के साथ-साथ उत्तर प्रदेश तक के बच्चे पढ़ रहे हैं. वर्तमान में 65 बच्चे हैं, जिनके खाने-पीने से लेकर रहने तक की व्यवस्था यहां की गई है. इस गुरुकुल में बच्चों के माता-पिता से एक रुपए भी नहीं लिए जाते हैं. बल्कि सब कुछ यहां की जो सोसाइटी दिल्ली पिंजरापोल है. वह खर्चा उठाती है.

उन्होंने बताया कि यहां पर बच्चों को संस्कृत और कर्मकांड के साथ-साथ आधुनिक विषयों की भी पढ़ाई कराई जाती है. ताकि आगे चलकर बच्चे किसी भी क्षेत्र में जा सकें. उन्होंने यह भी बताया कि यह गुरुकुल कक्षा 6 से लेकर कक्षा 12वीं तक है. यहां पर बच्चों को कंप्यूटर भी पढ़ाया जाता है और हर विषय की पढ़ाई यहां होती है. उन्होंने यह भी बताया कि आगे चलकर बच्चे गृहस्थ जीवन जीना चाहें तो जी सकते हैं. गुरुकुल की पढ़ाई का मतलब संन्यास लेना बिल्कुल भी नहीं है.

कड़े अनुशासन में रहते हैं बच्चे

आचार्य किशन त्रिपाठी ने बताया कि यहां पर बच्चों का अनुशासन बेहद कड़ा होता है. सुबह के 4:00 उन्हें उठना होता है. योगा करना होता है और यहां पर गौशाला है तो गौ माता की आरती में भी बच्चे जाते हैं. इसके बाद सुबह 7:00 बजे से लेकर 8:00 बजे तक बच्चों की क्लास होती है. 8 से 9:00 बजे तक नाश्ता होता है. 9 से 12 बजे तक क्लास होती है. फिर 12 से एक लंच होता है. फिर 1:00 से लेकर 5:00 तक क्लास होती है. फिर 5:00 बच्चे तिलक करते हैं और आरती में शामिल होते हैं. इसके बाद रात में 7:00 से 8:00 बजे तक बच्चे रिवीजन करते हैं और 8 से 8:30 के बीच डिनर होता है. सोने से पहले बच्चे एक बार फिर रिवीजन करते हैं. 9:30 बजे तक बच्चे यहां सोते हैं और सुबह 4:00 बजे फिर उठ जाते हैं.

बच्चे बोले- आधुनिक पढ़ाई और संस्कार दोनों जरूरी

यहां पर मध्य प्रदेश से आए हुए छात्र अभिनव ने बताया कि उन्हें इस गुरुकुल में बहुत अच्छा लगता है. बचपन से ही कड़ा अनुशासन जी रहे हैं. इसलिए आगे चलकर कुछ करने और कुछ बनने का जज्बा है. उन्होंने बताया कि गुरुकुल में पढ़ने का मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है कि बच्चे सिर्फ संस्कृत या कर्मकांड तक सीमित रहेंगे. यहां हर विषय की पढ़ाई होती है.

वहीं, गोरखपुर के रहने वाले छात्र अंकुश पांडेय ने बताया कि आधुनिक स्कूलों में सिर्फ वेस्टर्न कल्चर को फॉलो करते हैं. यहां हर विषय की पढ़ाई करने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति को हम लोग फॉलो करते हैं. एक और छात्र अभिनंदन ने बताया कि बाकी स्कूलों में वेस्टर्न कल्चर और आधुनिक पढ़ाई होती है. साथ ही यहां आधुनिक पढ़ाई होती है, लेकिन कल्चर भारतीय संस्कृति है. आकाश गौतम ने कहा कि उनके माता-पिता खेती करते हैं, लेकिन उन्हें गुरुकुल में इसलिए डाला है. ताकि पढ़ाई के साथ-साथ जीवन में कड़ा अनुशासन आ सके और भारतीय संस्कृति को समझ सकें.

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