Last Updated:
दीपा सिंह लोकल18 से बताती हैं कि जब उन्होंने कराटे क्लास ज्वाइन की थी, तब उनकी उम्र सिर्फ 14 साल थी. हालांकि पावर लिफ्टिंग और बॉडी बिल्डिंग करते हुए उन्हें सिर्फ एक साल ही हुआ है, लेकिन इतने कम समय में उन्होंने कई इंटरनेशनल अवॉर्ड हासिल किए हैं. उनका कहना है कि समय मायने नहीं रखता, बल्कि आपके अंदर लगन और जुनून होना चाहिए. उनका मानना है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत सच्ची हो तो सफलता जरूर मिलती है.
नोएडा: पिता का सपना, बेटी का एक वादा और फिर शुरू हुआ संघर्षों से भरा ऐसा सफर, जिसने हर मुश्किल को मात दे दी. कभी परिवार ने खेल छोड़ने के लिए पीटा, कभी प्रतियोगिता में जाने से पहले टिकट फाड़ दिए गए, लेकिन दीपा सिंह ने हार नहीं मानी. पिता के सपने को अपना लक्ष्य बनाया और आज इंटरनेशनल स्तर पर गोल्ड मेडल जीतकर देश का नाम रोशन कर रही हैं. इतना ही नहीं, अब वह अपने घर की छत पर गरीब बच्चों को मुफ्त में प्रशिक्षण देकर उनके सपनों को भी उड़ान दे रही हैं.
पावर लिफ्टिंग और बॉडी बिल्डिंमें मिला गोल्ड
दीपा सिंह लोकल18 से बताती हैं कि जब उन्होंने कराटे क्लास ज्वाइन की थी, तब उनकी उम्र सिर्फ 14 साल थी. हालांकि पावर लिफ्टिंग और बॉडी बिल्डिंग करते हुए उन्हें सिर्फ एक साल ही हुआ है, लेकिन इतने कम समय में उन्होंने कई इंटरनेशनल अवॉर्ड हासिल किए हैं. उनका कहना है कि समय मायने नहीं रखता, बल्कि आपके अंदर लगन और जुनून होना चाहिए. उनका मानना है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत सच्ची हो तो सफलता जरूर मिलती है. इसी सोच के साथ उन्होंने अपने खेल को लगातार बेहतर बनाया और राष्ट्रीय स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक अपनी पहचान बनाई.
खेल छोड़ने के परिवार ने पीटा
अपनी जिंदगी के कठिन दौर को याद करते हुए दीपा बताती हैं कि वह ऐसी पहली लड़की नहीं हैं, जिसने यह सब झेला हो. उनके मुताबिक ऐसी परिस्थितियां बहुतों के साथ होती हैं. वह बताती हैं कि एक समय उनके परिवार वालों ने उन्हें खेल छोड़ने के लिए पीटा था, ताकि वह स्पोर्ट्स छोड़ दें. लेकिन यह उनके पिताजी का सपना था, जिसे पूरा करने की जिद उन्होंने ठान ली थी. उन्होंने बताया कि कई बार ऐसा हुआ जब प्रतियोगिता के लिए उनका चयन हो गया, लेकिन जाने से पहले उनके भाई ने टिकट तक फाड़ दिए. इसके बावजूद उन्होंने अपना हौसला नहीं छोड़ा और लगातार मेहनत करती रहीं.
उनके जैसा कोई न झेले
दीपा बताती हैं कि उन्होंने अपनी जिंदगी में एक और संकल्प लिया कि जो परेशानियां उन्हें मिलीं, वह किसी और की जिंदगी में न आएं. इसी सोच के साथ उन्होंने अपने घर की छत पर एक अकादमी भी खोली है, जहां वह बच्चों को प्रशिक्षण देती हैं और गरीब बच्चों को मुफ्त में अपना हुनर सिखाती हैं. उनका सपना है कि जो गरीब बच्चे आर्थिक हालात के चलते अपने सपने पूरे नहीं कर पाते, उन्हें उनकी मदद मिल सके. उन्होंने यह भी बताया कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों और स्थानीय सरकारी नुमाइंदों से उन्हें अभी तक कोई सहयोग नहीं मिला. पिता के बाद अगर किसी ने उनका सबसे ज्यादा साथ दिया, तो वह उनके कराटे कोच प्रीतम राठौर रहे. उन्होंने अपनी बेटी से भी ज्यादा उन्हें सपोर्ट किया और कभी भी नाम या प्रसिद्धि के लिए सामने नहीं आए, बल्कि हमेशा पीछे रहकर उनका हौसला बढ़ाया.
थाईलैंड में जीता पदक
वहीं, मयूर विहार फेस-3 में वीर वोहित से दीपा ने पावर लिफ्टिंग और बॉडी बिल्डिंग का हुनर सीखा. वर्ष 2025 में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर दो गोल्ड मेडल जीते, जबकि इस वर्ष जून में थाईलैंड में आयोजित प्रतियोगिता में तीन गोल्ड मेडल जीतकर नोएडा के साथ-साथ पूरे भारत का नाम रोशन किया. दीपा का कहना है कि उनका सफर अभी खत्म नहीं हुआ है. वह ओलंपिक में हिस्सा लेना चाहती है. और साथ ही ऐसे बच्चों को तैयार करना चाहती हैं, जो संसाधनों की कमी के कारण अपने सपनों को अधूरा छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं.
About the Author
मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें
