गाजियाबाद का दूधेश्वरनाथ मंदिर: रावण काल से जुड़ा है इतिहास, शिवाजी ने भी की थी पूजा, जानिए अनसुनी कहानी

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Dudheshwarnath Mandir Ghaziabad: गाजियाबाद का ऐतिहासिक श्री दूधेश्वरनाथ महादेव मंदिर सिर्फ एक देवालय नहीं, बल्कि सदियों पुरानी जीवित विरासत है. मान्यता है कि त्रेतायुग में रावण के पिता महर्षि विश्रवा ने यहां हिंडन नदी के किनारे तपस्या की थी, वहीं औरंगजेब के काल में छत्रपति शिवाजी महाराज ने यहां आकर मंदिर के जीर्णोद्धार का संकल्प लिया था. टीले से प्रकट हुए इस चमत्कारी स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन और सावन में जलाभिषेक के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं. जानिए इस सिद्धपीठ की पूरी कहानी…

Dudheshwarnath Mandir Ghaziabad: गाजियाबाद की पहचान सिर्फ ऊंची इमारतों, मेट्रो और उद्योगों से नहीं है, बल्कि यहां सदियों पुरानी धार्मिक विरासत भी आज जीवित है. इन्हीं विरासतों में सबसे खास है श्री दूधेश्वरनाथ महादेव मंदिर. मान्यता है कि इस मंदिर का इतिहास रावण काल से जुड़ा है. यहां स्वयंभू शिवलिंग विराजमान है और छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी यहां आकर भगवान शिव की पूजा की थी. सावन और महाशिवरात्रि में लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनने वाला यह मंदिर आखिर इतना खास क्यों है? आइए जानते हैं गाजियाबाद के इस ऐतिहासिक शिवधाम की पूरी कहानी.

महर्षि विश्रवा की तपस्थली और रावण काल से जुड़ा इतिहास
दूधेश्वरनाथ महादेव मंदिर को लेकर सबसे बड़ी मान्यता यह है कि यहां स्थापित शिवलिंग स्वयंभू है, यानी भगवान शिव का यह स्वरूप अपने आप प्रकट हुआ था. मंदिर की परंपरा के अनुसार, इसका इतिहास त्रेतायुग और रावण काल से जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि लंकापति रावण के पिता महर्षि विश्रवा ने हिंडन नदी के किनारे वर्षों तक कठोर तपस्या की थी. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए, इसके बाद रावण भी यहां आकर भगवान शिव की आराधना करता था.

जब टीले की खुदाई में प्रकट हुए महादेव: नाम के पीछे की रोचक कहानी
मंदिर के नाम के पीछे भी एक रोचक कहानी बताई जाती है. मंदिर के महंत नारायण गिरी महाराज ने बताया कि जिस स्थान पर आज मंदिर है, वहां पहले एक टीला हुआ करता था. आसपास चरने वाली गायें रोज उस स्थान पर पहुंचकर अपने आप दूध गिराने लगती थीं. जब ग्रामीणों ने वहां खुदाई कराई, तो जमीन के भीतर से दिव्य शिवलिंग प्रकट हुआ. इसी घटना के बाद भगवान शिव का नाम ‘दूधेश्वरनाथ’ पड़ गया और यहां मंदिर की स्थापना हुई.

छत्रपति शिवाजी महाराज का आगमन और मंदिर का जीर्णोद्धार
यह मंदिर हजारों साल पुराना बताया जाता है. इसके बाद यह स्थान धीरे-धीरे एक बड़े सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध हो गया और देशभर से श्रद्धालु यहां आने लगे. आज भी यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रमुख शिवधामों में गिना जाता है. इतिहास में इस मंदिर का संबंध मराठा वीर छत्रपति शिवाजी महाराज से भी जोड़ा जाता है. औरंगजेब के समय शिवाजी महाराज यहां आए थे. उन्होंने भगवान दूधेश्वरनाथ की पूजा-अर्चना की, हवन कराया और मंदिर के जीर्णोद्धार का संकल्प लिया. मंदिर परिसर में मौजूद प्राचीन हवनकुंड को भी इसी परंपरा से जोड़ा जाता है.

गाजियाबाद की सांस्कृतिक पहचान और कांवड़ यात्रा का मुख्य केंद्र
आज यह मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि गाजियाबाद की सांस्कृतिक पहचान भी है. सावन के प्रत्येक सोमवार, महाशिवरात्रि और कांवड़ यात्रा के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है. दूर-दूर से आने वाले कांवड़िये यहां जलाभिषेक करते हैं और भगवान भोलेनाथ से सुख, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं. मंदिर परिसर में धार्मिक अनुष्ठान, भजन-कीर्तन और विशेष पूजन का आयोजन भी नियमित रूप से होता है.

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Rahul Goel

राहुल गोयल न्यूज़ 18 हिंदी में हाइपरलोकल (यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश) के लिए काम कर रहे हैं. मीडिया इंडस्ट्री में उन्हें 16 साल से ज्यादा का अनुभव है, जिसमें उनका फोकस हमेशा न्यू मीडिया और उसके त…और पढ़ें

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