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Noida News: नोएडा सेक्टर-132 स्थित ग्राम रोहिल्लापुर के किसानों ने नोएडा प्राधिकरण पर सवाल खड़े किए हैं. किसानों का कहना है कि प्राधिकरण के साथ पूर्व में हुए लिखित समझौते और आबादी विनियमीकरण की प्रक्रिया के बावजूद खसरा संख्या-4 की जमीन पर 5 प्रतिशत भूखंड लगाए जाने की प्रक्रिया की जा रही है.
नोएडा: नोएडा सेक्टर-132 स्थित ग्राम रोहिल्लापुर के किसानों ने नोएडा प्राधिकरण पर उनकी पुरानी और पैतृक गांव की आबादी की जमीन को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं. किसानों का दावा है कि प्राधिकरण के साथ पूर्व में हुए लिखित समझौते और आबादी विनियमीकरण की प्रक्रिया के बावजूद खसरा संख्या-4 की जमीन पर 5 प्रतिशत भूखंड लगाए जाने की प्रक्रिया की जा रही है.
किसानों का कहना है कि इस कार्रवाई से ग्रामीणों में नाराजगी और असमंजस की स्थिति है. इसी मामले को लेकर लोकल 18 की टीम ने पीड़ित किसान रंजन तोमर और अजीत सिंह तोमर बजरंगी से खास बातचीत की, जिसमें उन्होंने पूरे विवाद और अपने पक्ष से जुड़े दस्तावेजों की जानकारी साझा की.
2016 में किसानों ने सड़क के लिए दी थी सहमति
किसान रंजीत सिंह तोमर बजरंगी ने बताया कि संबंधित भूमि का मुआवजा उन्हें अब तक नहीं मिला है और जमीन से जुड़े मामले में जिला न्यायालय के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय में भी विचाराधीन है. किसानों का दावा है कि मुआवजा प्राप्त नहीं होने की स्थिति में प्राधिकरण इस भूमि का पूर्ण कानूनी स्वामी नहीं बना है. उनका यह भी कहना है कि खसरा संख्या-4 के बीच से गुजरने वाली 24 मीटर चौड़ी सड़क का निर्माण वर्षों तक पुरानी गांव की आबादी के कारण लंबित रहा था. वर्ष 2016 में प्राधिकरण के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुरोध पर किसानों ने सड़क निर्माण के लिए सहमति दी.
गठित 5 (1) कमेटी कर चुकी है निरीक्षण और परीक्षण
किसानों का आरोप है कि उस दौरान उन्हें आश्वासन दिया गया था कि सड़क और इंस्टीट्यूशनल प्लॉट में आने वाली भूमि का नियमानुसार मुआवजा दिया जाएगा, जबकि गांव की आबादी की ओर स्थित बाकि भूमि का आबादी विनियमावली के तहत विनियमीकरण किया जाएगा. किसानों का कहना है कि इसके बाद प्राधिकरण की ओर से भूमि का सर्वे कराया गया और आबादी विनियमावली के तहत गठित 5(1) कमेटी ने मौके का निरीक्षण और परीक्षण किया. किसानों के मुताबिक, कमेटी की रिपोर्ट में उनकी आबादी को मान्यता देते हुए आबादी विनियमीकरण की संस्तुति की गई थी और वर्ष 2017 में विनियमीकरण की प्रक्रिया भी आगे बढ़ी.
2003 में इस जमीन को किया गया था आबादी घोषित
किसानों ने दावा किया कि वर्ष 2003 में तत्कालीन सीईओ की ओर से भी इस भूमि को आबादी मानते हुए शासन को संदर्भित करने के आदेश दिए गए थे. उनका कहना है कि यह जमीन प्राधिकरण की ओर से पहले से निर्धारित ग्राम परिधि के भीतर स्थित पुरानी गांव की आबादी है, ऐसे में यहां 5 प्रतिशत भूखंड लगाए जाने की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं. किसानों ने यह भी आरोप लगाया कि जिस जमीन को लेकर न्यायालयों में मामले लंबित हैं, वहां किसी भी तरह की नई कार्रवाई न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है. उनका कहना है कि पूर्व में हुए लिखित समझौते के बावजूद 5 प्रतिशत भूखंड लगाए जाने की प्रक्रिया समझ से परे है. किसानों ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग की है.
10 से 12 करोड़ इस आबादी की कीमत
मामले को लेकर गांव के किसानों ने प्राधिकरण के आलाधिकारियों और स्थानीय विधायक पंकज सिंह से भी मुलाकात की. किसानों के अनुसार, मुलाकात के बाद प्राधिकरण के आलाधिकारियों ने मामले की जांच के लिए एक जांच समिति गठित करने और निष्पक्ष जांच के बाद आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया है. किसानों की मानें तो आज के रेट से इस पूरी आबादी की कीमत करीब 10-12 करोड़ होगी, जो प्राधिकरण के सम्बन्धित अधिकारी ऐसे ही अवैध तरह से कब्जाने की फिराक में हैं.
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आर्यन सेठ, News18 Hindi में डिजिटल डेस्क पर जुड़े हैं और जनवरी 2026 से उत्तर प्रदेश की राजनीति, अपराध, प्रशासन, वायरल और अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर खबरें लिखते हैं. जामिया मिलिया इस्लामिया दिल्ल…और पढ़ें
