नई दिल्ली: समाज में ऑटिज्म, ADHD और डिस्लेक्सिया जैसे न्यूरोडाइवर्जेंस को लेकर आज भी कई तरह की गलतफहमियां हैं. जानकारी की कमी के कारण कई बार ऐसे बच्चों को समझने के बजाय उनसे दूरी बना ली जाती है. कुछ मामलों में उनके व्यवहार का मजाक भी बनाया जाता है. इसी सोच को बदलने और न्यूरोडाइवर्जेंट लोगों को बेहतर तरीके से समझने में मदद करने के लिए Enactus Ramjas ने प्रोजेक्ट अनुभवा की शुरुआत की है.
क्या है प्रोजेक्ट अनुभवा
Enactus Ramjas का प्रोजेक्ट अनुभवा खास तौर पर न्यूरोडाइवर्जेंट लोगों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है. इसमें ऑटिज्म, ADHD और डिस्लेक्सिया जैसे मामलों को शामिल किया गया है. प्रोजेक्ट का मकसद सिर्फ बच्चों की मदद करना नहीं है. इसके जरिए समाज में न्यूरोडाइवर्जेंस को लेकर जागरूकता फैलाने की भी कोशिश की जा रही है.
कम्युनिकेशन गैप को कम करेंगे
टीम के मुताबिक, कई बार न्यूरोडाइवर्जेंट बच्चों को अपनी भावनाओं को समझने में परेशानी होती है. उन्हें अपनी बात दूसरों तक पहुंचाने में भी कठिनाई हो सकती है. ऐसे में उनका व्यवहार दूसरे लोगों को अलग या आक्रामक लग सकता है. जबकि कई बार इसके पीछे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में होने वाली परेशानी होती है. प्रोजेक्ट अनुभवा इसी कम्युनिकेशन गैप को कम करने की कोशिश कर रहा है. इसके जरिए बच्चों को अपनी भावनाओं को पहचानने और उन्हें बेहतर तरीके से व्यक्त करने में मदद दी जाएगी.
रंगों के जरिए समझेंगे अपनी भावनाएं
प्रोजेक्ट के तहत टीम ने खास क्यू कार्ड्स तैयार किए हैं. इन कार्ड्स में अलग-अलग भावनाओं को अलग-अलग रंगों से जोड़ा गया है. उदाहरण के तौर पर हरे रंग को खुशी और सकारात्मक भावनाओं से जोड़ा गया है. वहीं, लाल रंग गुस्से या नकारात्मक भावनाओं को दिखाता है. इन कार्ड्स की मदद से बच्चे यह पहचान सकेंगे कि वे इस समय कैसा महसूस कर रहे हैं. इसके साथ ही वे अपनी भावना के हिसाब से प्रतिक्रिया देने का तरीका भी समझ सकेंगे. टीम का मानना है कि रंगों और कार्ड्स के जरिए भावनाओं को समझना बच्चों के लिए आसान हो सकता है. इससे उन्हें अपनी भावनाओं को पहचानने में मदद मिलेगी. साथ ही वे अपनी बात दूसरों तक बेहतर तरीके से पहुंचा सकेंगे.
समाज की सोच बदलना भी मकसद
प्रोजेक्ट अनुभवा का दायरा सिर्फ बच्चों तक सीमित नहीं है. टीम का एक बड़ा लक्ष्य समाज में न्यूरोडाइवर्जेंस को लेकर जागरूकता बढ़ाना भी है. Enactus Ramjas की टीम के अनुसार, रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसे कई मामले सामने आते हैं, जहां ऑटिस्टिक लोगों को समझने के बजाय उनका मजाक बनाया जाता है. कई बार उन्हें समाज में आसानी से स्वीकार भी नहीं किया जाता. जानकारी और समझ की कमी के कारण उनके व्यवहार को गलत नजरिए से देखा जाता है. प्रोजेक्ट के जरिए लोगों को यह समझाने की कोशिश की जाएगी कि न्यूरोडाइवर्जेंट लोगों के व्यवहार और उनकी जरूरतों को समझना जरूरी है. उन्हें अलग करने के बजाय सहयोग और सम्मान देने की जरूरत है.
NGOs और एक्सपर्ट्स से ली गई मदद
प्रोजेक्ट अनुभवा को तैयार करने के लिए छात्रों ने विशेषज्ञों की भी मदद ली है. टीम ने मनोविज्ञान विभाग के शिक्षकों, मनोवैज्ञानिकों और NGOs से बातचीत की है. इन बातचीत के आधार पर प्रोजेक्ट की गतिविधियों और सामग्री को तैयार किया जा रहा है. टीम ने NGOs के साथ मिलकर बच्चों के लिए ट्रेनिंग सेशन आयोजित करने की भी योजना बनाई है. इन सेशन के जरिए बच्चों को अपनी भावनाओं और व्यवहार को समझने में मदद दी जाएगी.
बोर्ड गेम और किताब भी होगी तैयार
प्रोजेक्ट अनुभवा के तहत टीम एक बोर्ड गेम भी तैयार कर रही है. इसका मकसद आम लोगों को खेल-खेल में न्यूरोडाइवर्जेंट लोगों के व्यवहार और उनकी जरूरतों को समझाना है. बोर्ड गेम के जरिए लोगों को यह समझने का मौका मिलेगा कि न्यूरोडाइवर्जेंट व्यक्ति अलग-अलग परिस्थितियों में किस तरह की चुनौतियों का सामना कर सकते हैं.
गलत धारणाओं को कम किया जाए
इसके अलावा एक किताब भी तैयार की जा रही है. इसमें अलग-अलग गतिविधियां और सामग्री शामिल की जाएंगी. इनकी मदद से बच्चे भावनाओं और उनकी भाषा को समझ सकेंगे. प्रोजेक्ट अनुभवा के जरिए छात्रों की कोशिश है कि न्यूरोडाइवर्जेंस को लेकर समाज में मौजूद गलत धारणाओं को कम किया जाए. साथ ही बच्चों को अपनी भावनाओं को समझने और व्यक्त करने के लिए आसान साधन उपलब्ध कराया जाए. टीम का मानना है कि जागरूकता और सही समझ के जरिए न्यूरोडाइवर्जेंट लोगों के लिए समाज को ज्यादा संवेदनशील और स्वीकार करने वाला बनाया जा सकता है.
