नदियां नहीं बचीं तो सभ्यता कैसे बचेगी… नाला बनती हिंडन और यमुना को बचा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा 'वॉलेंटियर्स 137'

नोएडा: स्थानीय समस्याओं और बुनियादी सुविधाओं से परे जाकर जब नागरिक पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की चिंता करने लगें, तो वह एक बड़े बदलाव की शुरुआत होती है. नोएडा के सेक्टर-137 में स्थित हाउसिंग सोसायटियों के निवासियों का समूह ‘वॉलेंटियर्स 137’ आज देश की जीवनदायिनी नदियों को बचाने के लिए एक मिसाल बनकर उभरा है. दिल्ली-एनसीआर में जीवनदायिनी यमुना और हिंडन नदी के तेजी से गिरते जल स्तर और बढ़ते प्रदूषण को लेकर इस समूह ने सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. इस जनहित याचिका का असर यह हुआ कि सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देशों के बाद खुद केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में कई राज्यों के उच्च अधिकारियों की एक अहम बैठक संपन्न हुई है.

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केंद्रीय गृह सचिव की अहम बैठक
नोएडा के सेक्टर-137 के निवासियों के समूह ‘वॉलेंटियर्स 137’ ने यमुना और हिंडन में बढ़ते प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में संबंधित राज्यों के वरिष्ठ अधिकारियों की उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गई. ‘वॉलेंटियर्स 137’ के प्रमुख सदस्य अभिष्ट गुप्ता ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केंद्रीय गृह सचिव ने यह बैठक बुलाई थी. यह बैठक सिविल अपील (दिल्ली जल बोर्ड बनाम अभिष्ट कुसुम गुप्ता एवं अन्य) के तहत यमुना में गंभीर प्रदूषण के मुद्दे पर आयोजित की गई थी.

चार राज्यों ने प्रस्तुत किया एक्शन प्लान
समूह के सदस्यों ने लोकल 18 से बातचीत करते हुए बताया कि इस महत्वपूर्ण बैठक में उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. सभी राज्यों की ओर से नदी प्रदूषण की रोकथाम और जल शोधन को लेकर अपने-अपने एक्शन प्लान प्रस्तुत किए गए. अभिष्ट गुप्ता के अनुसार, अब उम्मीद है कि इन कार्ययोजनाओं पर धरातल पर जल्द काम शुरू होगा और यमुना तथा हिंडन को प्रदूषण से बचाने के लिए ठोस व प्रभावी कदम उठाए जाएंगे.

प्रकृति के करीब रहने आए थे, मिला गंदा नाला
नोएडा का सेक्टर-137 भौगोलिक रूप से यमुना और हिंडन नदी के ठीक बीच में बसा हुआ है. यहां बनी कई बड़ी और आधुनिक हाउसिंग सोसायटियों में 50 हजार से अधिक लोग निवास करते हैं. समूह की सदस्य एडवोकेट कोमल गुप्ता, अर्चना शुक्ला, सार्थक झा, एके झा और अभिष्ट गुप्ता ने बताया कि उन्होंने यहां आशियाना इसलिए खरीदा था ताकि उन्हें प्राकृतिक वातावरण और नदियों के करीब रहने का अवसर मिलेगा. हालांकि, समय के साथ दोनों नदियों में प्रदूषण का स्तर अत्यधिक बढ़ता गया और नदियों का स्वरूप जहरीले गंदे नालों में तब्दील हो गया.

सब्जियों में जहरीला पानी और स्वास्थ्य संकट
समूह के सदस्यों का स्पष्ट कहना है कि अब यह लड़ाई सिर्फ नदियों को बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य और भविष्य की रक्षा करने की है. निवासियों ने नदी प्रदूषण का आम जनता की सेहत पर पड़ रहे दुष्प्रभावों पर गहरी चिंता व्यक्त की है. वर्तमान में यमुना और हिंडन के तटवर्ती क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर सब्जियां उगाई जा रही हैं और उनकी सिंचाई के लिए नदियों के इसी प्रदूषित व विषैले पानी का निर्बाध इस्तेमाल किया जा रहा है.

बच्चों के लिए नाला बन चुकी है हिंडन: रिवरफ्रंट की मांग
एक सदस्य ने दुख जताते हुए कहा कि आज स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि जब बच्चों को बताया जाता है कि हिंडन एक नदी है, तो वे इसे महज़ एक नाला समझते हैं. यह स्थिति नई पीढ़ी के दृष्टिकोण और पर्यावरण के लिए अत्यंत चिंताजनक है. ‘वॉलेंटियर्स 137’ की मांग है कि हिंडन नदी के किनारे योजनाबद्ध तरीके से रिवरफ्रंट विकसित किया जाए, जिससे नदी के तटों को सुरक्षित करने के साथ-साथ आम जनमानस को पुनः नदियों से जोड़ा जा सके. इस संदर्भ में समूह की ओर से नोएडा प्राधिकरण के माध्यम से प्रदेश सरकार को एक विस्तृत प्रस्ताव भी भेजा गया है.

अवैध कॉलोनियां और ‘डेड रिवर’ बनती हिंडन
‘वॉलेंटियर्स 137’ के सदस्यों ने हिंडन और यमुना में बढ़ते प्रदूषण के मुख्य कारणों में नदियों के डूब क्षेत्र (कैचमेंट एरिया) में हो रहे अवैध निर्माण को जिम्मेदार ठहराया है. उनका आरोप है कि नदियों के आसपास लगातार अवैध कॉलोनियां बसाई जा रही हैं, जिससे सीवेज और कचरे का दबाव अत्यधिक बढ़ता जा रहा है. समूह का कहना है कि अवैध निर्माण पर शुरुआती दौर में ही सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए. हिंडन को ‘डेड रिवर’ (मृत नदी) करार देते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो यह नदी पूरी तरह से एक विषैले नाले में तब्दील हो जाएगी. चूंकि मानव सभ्यताओं का विकास हमेशा नदियों के तट पर हुआ है, ऐसे में नदियों के अस्तित्व के बिना पर्यावरण, जैव विविधता और मानव जीवन का सुरक्षित रहना असंभव है.

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