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Justice Yashwant Varma Case: जस्टिस यशवंत वर्मा जब दिल्ली हाईकोर्ट के जज थे तो उनके सरकारी आवास पर आग लग गई थी. आग बुझाने के क्रम में वहां से बड़ी मात्रा में जले हुए नोट बरामद हुए थे. उसके बाद उनका ट्रांसफर इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया था.
जस्टिस यशवंत वर्मा के इस्तीफे के बाद भी लोकसभा अध्यक्ष ने कमेटी से जांच पूरी करने को कहा था. (फाइल फोटो)
Justice Yashwant Varma Case: जस्टिस यशवंत वर्मा के इस्तीफा देने के बाद भी उनके खिलाफ जांच प्रक्रिया किसके कहने पर जारी रही? जांच कमेटी की रिपोर्ट में इसका खुलासा किया गया है. रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख है कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के करीब 20 दिन बाद 3 सदस्यीय जांच समिति को अपनी जांच पूरी कर रिपोर्ट सौंपने को कहा था. समिति की 126 पन्नों की रिपोर्ट में लोकसभा सचिवालय की ओर से 29 अप्रैल को भेजे गए पत्र का उल्लेख है, जिसमें कहा गया था कि लोकसभा अध्यक्ष चाहते हैं कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 (Judges (Inquiry) Act, 1968) की धारा 4(2) के तहत जांच पूरी कर रिपोर्ट पेश की जाए.
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि जस्टिस वर्मा के 9 अप्रैल को इस्तीफा देने और जांच प्रक्रिया से हटने के बावजूद जांच समाप्त नहीं हो सकती थी. समिति ने कहा कि 21 अप्रैल को ही वह इस निष्कर्ष पर पहुंच चुकी थी कि जस्टिस वर्मा की कार्यवाही से हटने की घोषणा से जांच खत्म नहीं होगी. समिति के अनुसार, उस समय तक जस्टिस वर्मा के खिलाफ आरोप तय कर उन्हें सौंपे जा चुके थे. बचाव पक्ष का बयान और अतिरिक्त बयान रिकॉर्ड पर आ चुका था. संबंधित दस्तावेजों का निरीक्षण हो चुका था, अंतरिम आवेदनों पर सुनवाई की जा चुकी थी और 9 गवाहों से पूछताछ और जिरह भी पूरी हो चुकी थी. इसके अलावा दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी रिकॉर्ड का हिस्सा बन चुके थे.
जांच समिति का क्या कहना
समिति ने कहा कि इतनी आगे बढ़ चुकी वैधानिक जांच को किसी एक पक्ष के एकतरफा तरीके से हटने के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता. रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस वर्मा ने अपने वकीलों के माध्यम से कार्यवाही में हिस्सा लिया था, प्रक्रिया को चुनौती दी, अंतरिम आवेदन दाखिल किए, रिकॉर्ड का निरीक्षण किया और गवाहों से जिरह भी की. ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस वर्मा उस समय जांच से अलग हुए जब उन्हें अपने बचाव में गवाह और साक्ष्य पेश करने थे. रिपोर्ट में कहा गया कि ऐसे चरण में कार्यवाही से हटना न तो जांच को भंग कर सकता है और न ही पहले से रिकॉर्ड पर आ चुके साक्ष्यों को खत्म कर सकता है. समिति ने यह भी कहा कि जस्टिस वर्मा को गवाहों से जिरह करने, साक्ष्य पेश करने और अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया गया था. जस्टिस वर्मा ने 9 अप्रैल को आगे की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लेने का फैसला लिया था. वह निर्धारित समयसीमा के भीतर अपने बचाव पक्ष के गवाहों की सूची और हलफनामे पेश नहीं कर पाए थे. इसके बाद समिति ने उनके पक्ष में पेश हो रहे वकीलों को कार्यवाही से मुक्त कर दिया और जांच पूरी करते हुए कहा कि रिपोर्ट बाद में पेश की जाएगी.
लोकाभा सचिवालय का पत्र
29 अप्रैल को लोकसभा सचिवालय की ओर से पत्र भेजा गया. स्पीकर की ओर से दिए गए निर्देश ने साफ कर दिया कि जस्टिस वर्मा का इस्तीफा संसद की ओर से शुरू की गई वैधानिक जांच के लिए स्वत: अंत नहीं माना गया. समिति ने इसके बाद उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार की. उसने स्पष्ट किया कि निष्कर्ष केवल जांच के दौरान रिकॉर्ड पर आए दस्तावेजों, बचाव पक्ष के बयानों, मौखिक साक्ष्यों, जिरह, प्रदर्शों तथा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर आधारित हैं. जस्टिस वर्मा ने संसद की ओर से उनके खिलाफ शुरू की गई प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी थी. जनवरी 2026 में जस्टिस दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली पीठ ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा था कि जजों के संवैधानिक संरक्षण का अर्थ यह नहीं हो सकता कि उन्हें हटाने की प्रक्रिया ही ठप हो जाए. अदालत ने यह दलील भी स्वीकार नहीं की कि राज्यसभा में समानांतर महाभियोग प्रस्ताव स्वीकार नहीं किए जाने या उपराष्ट्रपति के पद में रिक्ति के कारण लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित जांच समिति की प्रक्रिया रुक जानी चाहिए.
यह है पूरा मामला
पूरा मामला 14 मार्च 2025 की रात दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग लगने के बाद कथित तौर पर जली हुई नकदी मिलने के विवाद से शुरू हुआ था. आंतरिक जांच में उनके स्पष्टीकरण को संतोषजनक नहीं पाया गया. इसके बाद तत्कालीन CJI जस्टिस संजीव खन्ना ने उन्हें इस्तीफा देने या संवैधानिक प्रक्रिया का सामना करने को कहा था. 21 जुलाई 2025 को दोनों सदनों में उनके खिलाफ हटाने के नोटिस दिए गए. लोकसभा अध्यक्ष ने 12 अगस्त को प्रस्ताव स्वीकार कर जांच समिति गठित की, जबकि राज्यसभा के उपसभापति ने समानांतर प्रस्ताव को दोषपूर्ण बताते हुए स्वीकार नहीं किया. समिति में शुरुआत में जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस मनिंदर मोहन श्रीवास्तव और सीनियर एडवोकेट बीवी आचार्य शामिल थे. जस्टिस श्रीवास्तव के सेवानिवृत्त होने के बाद जस्टिस चंद्रशेखर को समिति में शामिल किया गया.
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बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…
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