गाजियाबाद: जिस शहर की सड़कों पर आज ट्रैफिक का शोर सुनाई देता है, उसी शहर के बीचों-बीच अंग्रेजी हुकूमत के खौफ की एक निशानी आज भी मौजूद है. गाजियाबाद की घंटाघर कोतवाली के पीछे झाड़ियों और अंधेरे के बीच खड़ा गोलाकार ढांचा कभी फांसीघर हुआ करता था. लोहे की गार्डर, छत में लगा हुक, नीचे गहराई और ऊपर बना संतरी पोस्ट आज भी उस दौर की कहानी बयां करते हैं, जब 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेज बगावत करने वालों को सजा-ए-मौत देते थे.
गाजियाबाद की घंटाघर कोतवाली अंग्रेजी हुकूमत के जमाने की है. उस दौर में इसी कोतवाली से शहर की निगरानी और व्यवस्थाएं संभाली जाती थीं. 1857 की क्रांति के समय गाजियाबाद अलग जिला नहीं, बल्कि मेरठ जिले का हिस्सा था. मेरठ और दिल्ली के बीच होने की वजह से यह इलाका अंग्रेजों के लिए बेहद अहम था. बताया जाता है कि क्रांति के बाद पकड़े गए क्रांतिकारियों, कैदियों और बंदियों को इसी कोतवाली के पीछे बने फांसीघर में लाकर फांसी दी जाती थी.
मशाल और लाइट से होती थी निगरानी
फांसीघर का ढांचा आज भी अपने पुराने स्वरूप में मौजूद है. इसके अंदर जाने के लिए करीब 2 फीट चौड़ा छोटा दरवाजा है, जबकि पूरा ढांचा जमीन से लगभग 25 फीट ऊंचा है. इस फांसीघर के ऊपर कभी संतरी पोस्ट हुआ करता था. आसपास जंगल और सुनसान इलाका होने के कारण यहां से मशाल और लाइट से निगरानी की जाती थी. फांसी घर के अंदर छत से जुड़ी लोहे की गार्डर और एंगल आज भी दिखाई देते हैं, जिनका इस्तेमाल फांसी देने के लिए किया जाता था. नीचे करीब 4 फीट गहरी जगह बनी हुई है.
लोगों के जहन में घुमती कहानियां
बताया जाता है कि पहले यहां लकड़ी के दो फट्टे लगाए गए थे, जो फांसी दिए जाने के दौरान नीचे की ओर खुल जाते थे. लेकिन समय के साथ ये फट्टे टूट चुके हैं. आज अंदर अंधेरा और झाड़ियां हैं, लेकिन लोहे की यह संरचना उस दौर की पूरी कहानी अपने भीतर समेटे हुए है. कोतवाली के सामने करीब 1930 से चाय की दुकान चला रहे 44 वर्षीय विकास शर्मा इस इतिहास को अपने दादा की सुनाई कहानियों से जोड़ते हैं.
उनके दादा ओमप्रकाश बताया करते थे कि दूर-दराज के इलाकों से कैदियों को यहां लाया जाता था. फांसी पाने वालों के हाथ-पैर बांधकर और चेहरे पर कपड़ा डालकर उन्हें पैदल लाया जाता, जबकि अंग्रेज अफसर घोड़े या तांगे पर पहुंचते थे. विकास कहते हैं कि दादा की सुनाई ये बातें आज भी जेहन में हैं और सामने खड़ा फांसीघर उन किस्सों को सच होने का अहसास कराता है.
गाजियाबाद का अनोखा इतिहास
गाजियाबाद को वर्ष 1740 में मुगल बादशाह मोहम्मद शाह के वजीर गाजीउद्दीन ने बसाया था और नाम रखा था गाजीउद्दीननगर. अंग्रेजी शासन में 1864 में रेलवे आने के बाद शहर का नाम गाजियाबाद हुआ. उस समय शहर जवाहर गेट, दिल्ली गेट, डासना गेट और सिहानी गेट के भीतर सिमटा था. आजादी के बाद 14 नवंबर 1976 को गाजियाबाद को मेरठ से अलग कर जिला बनाया गया.
वर्ष 2019 में सफाई के दौरान झाड़ियों और कबाड़ के पीछे इसका प्रवेश द्वार सामने आया. अंदर मौजूद लोहे की संरचना और गहराई ने इसके फांसीघर होने की चर्चा को फिर सामने ला दिया. आज शहर महानगर बन चुका है, लेकिन कोतवाली के पीछे खड़ा यह जर्जर ढांचा अंग्रेजी दौर के उस इतिहास का खामोश गवाह है.
