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40 दिनों तक चले तनावपूर्ण संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्तों का सीजफायर लागू हुआ है, जिससे अस्थायी राहत मिली है. हालांकि गाजियाबाद के लोगों का मानना है कि यह सिर्फ विराम है, स्थायी शांति के लिए अभी ठोस समाधान जरूरी है और भविष्य में संघर्ष फिर बढ़ने की आशंका बनी हुई है.
गाजियाबाद. अमेरिका और ईरान के बीच छिड़ा तनावपूर्ण युद्ध पूरे 40 दिनों तक दुनिया की चिंता बना रहा. लगातार हमलों और बढ़ते खतरे के बीच आखिरकार दोनों देशों ने 2 हफ्तों के लिए सीजफायर पर सहमति जताई है, जिससे फिलहाल हालात में थोड़ी राहत जरूर आई है. लेकिन क्या यह विराम स्थायी शांति की शुरुआत है या फिर तूफान से पहले की खामोशी यह सवाल अब भी बना हुआ है. इसी मुद्दे पर गाजियाबाद के लोगों ने लोकल 18 से खास बातचीत करते हुए अपनी राय रखी. लोगों का कहना है कि यह सीजफायर सिर्फ अस्थायी राहत है असली समाधान अभी दूर है. कुछ ने इसे अमेरिका पर बढ़ते दबाव का असर बताया तो कुछ ने उम्मीद जताई कि अब युद्ध पूरी तरह खत्म होना चाहिए.
सीजफायर से अमेरिका की स्थिति कमजोर दिखी
नीरज त्यागी का कहना है कि इस युद्ध में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर स्पष्ट दबाव देखने को मिला. उनका मानना है कि युद्ध की शुरुआत अमेरिका ने नहीं की थी लेकिन 40 दिनों के बाद सीजफायर की घोषणा अमेरिका ने ही की जिससे उसकी स्थिति कमजोर दिखती है. उन्होंने कहा कि ट्रंप के फैसले अक्सर अप्रत्याशित होते हैं जिससे अमेरिका की वैश्विक छवि पर असर पड़ा है. दो हफ्तों के लिए लगाए गए विराम को वह स्थायी समाधान नहीं मानते. उनका कहना है कि इजरायल अभी भी लेबनान पर हमले कर रहा है, क्योंकि उसे इस सीजफायर में शामिल नहीं किया गया है. ऐसे में संघर्ष के पूरी तरह खत्म होने की संभावना कम लगती है. ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट का रणनीतिक रूप से फायदा उठाया जिससे अमेरिका पर दबाव बढ़ा और उसे सीजफायर के लिए मजबूर होना पड़ा. साथ ही उन्होंने कहा कि ट्रंप की लोकप्रियता में भी गिरावट देखी गई है.
जल्दबाजी का फैसला, लेकिन शांति की उम्मीद
पवन कुमार गौतम ने कहा कि पिछले 40 दिनों से चल रहे इस युद्ध में दो हफ्तों का विराम जरूर लगा है लेकिन यह निर्णय अमेरिकी राष्ट्रपति की जल्दबाजी का परिणाम है. उन्होंने इसे एक गलत आकलन बताया और कहा कि ईरान ने इसका करारा जवाब दिया. ईरान न केवल अमेरिका बल्कि इजरायल पर भी भारी पड़ा और अकेले ही दोनों देशों का मुकाबला करता नजर आया. गौतम ने कहा कि इस युद्ध के कारण अमेरिका को काफी नुकसान हुआ जिसे अब वह समझ चुका है. उन्होंने होर्मुज स्ट्रेट को भी एक अहम कारण बताया जिसने अमेरिका पर दबाव बनाया. भारत पर पड़े असर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश ने स्थिति को संभाल लिया है और अब हालात सामान्य हो रहे हैं. उनका मानना है कि यह विराम आगे चलकर स्थायी शांति में बदल सकता है क्योंकि पूरा विश्व यही चाहता है. साथ ही उन्होंने कहा कि इस युद्ध से ट्रंप को बड़ा राजनीतिक नुकसान हुआ है और उन्हें अब इसके परिणाम समझ में आ रहे होंगे.
भविष्य में फिर बढ़ सकता है संघर्ष
मनोज कुमार गिरि का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच हुआ यह सीजफायर ट्रंप के जल्दबाजी में लिए गए फैसलों का परिणाम है. उन्होंने कहा कि बिना पूरी समझ के युद्ध शुरू किया गया और अब अमेरिका बैकफुट पर नजर आ रहा है. इस संघर्ष में ईरान का पलड़ा भारी रहा और अमेरिका व इजरायल दबाव में दिखाई दिए. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर युद्ध जारी रहता तो अमेरिका और इजरायल को और ज्यादा नुकसान उठाना पड़ सकता था. हालांकि, उन्होंने यह भी आशंका जताई कि यह विराम स्थायी नहीं है और भविष्य में फिर से संघर्ष शुरू हो सकता है क्योंकि अमेरिका लंबे समय तक शांत रहने वाला देश नहीं है.
ईरान ने दिखाई सैन्य मजबूती
बीके शर्मा हनुमान ने अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भले ही युद्ध में दो सप्ताह का विराम घोषित किया गया है लेकिन वैश्विक स्तर पर यह चर्चा है कि इस टकराव में अमेरिका दबाव में आता नजर आया है. उनका मानना है कि ईरान ने इजरायल और अमेरिका दोनों के खिलाफ मजबूती से मोर्चा संभाला और अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन किया. उन्होंने कहा कि अमेरिका को यह गलतफहमी थी कि वह ईरान को आसानी से कमजोर कर देगा लेकिन ईरान ने डटकर मुकाबला किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत की. ईरान को अप्रत्यक्ष रूप से कुछ अन्य ताकतों का भी समर्थन मिला जिससे उसकी स्थिति और मजबूत हुई.
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नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें
