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1891 में जन्मे रघुनाथ विनायक धुलेकर मूलतः मराठी थे. इसके बावजूद उन्हें हिंदी से बेहद लगाव था. अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के उपाध्यक्ष हरगोविंद कुशवाहा बताते हैं कि रघुनाथ धुलेकर शुरूआत से ही हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिलाने की वकालत करते थे.
झांसी : लोकसभा चुनावों से जुड़े रोचक किस्सों में आज बात झांसी-ललितपुर लोकसभा क्षेत्र के पहले सांसद आचार्य रघुनाथ विनायक धुलेकर की करेंगे. रघुनाथ धुलेकर 1952 से 1957 तक झांसी के सांसद रहे. लेकिन, पंडित जवाहरलाल नेहरु से अनबन के चलते उन्हें दोबारा टिकट नहीं मिला. राजनीति के जानकार बताते हैं कि रघुनाथ धुलेकर को हिंदी बोलने और हिंदी की पैरवी करने की सजा मिली थी.
1891 में जन्मे रघुनाथ विनायक धुलेकर मूलतः मराठी थे. इसके बावजूद उन्हें हिंदी से बेहद लगाव था. अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के उपाध्यक्ष हरगोविंद कुशवाहा बताते हैं कि रघुनाथ धुलेकर शुरूआत से ही हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिलाने की वकालत करते थे. एक बार वह संसद में हिंदी में भाषण दे रहे थे. इस पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने उन्हें टोक दिया था. नेहरू ने कहा कि संसद में अलग-अलग भाषा को जानने वाले लोग हैं. आप बात अंग्रेजी में रखेंगे तो सभी को समझ आएगा.
10 भाषाओं के जानकार थे धुलेकर
नेहरू की यह बात सुनने के बाद धुलेकर ने अंग्रेजी के साथ ही मराठी, गुजराती, उड़िया, बंगाली, मलयालम, कन्नड़, संस्कृत समेत 10 भाषाओं में भाषण दिया. धुलेकर ने नेहरू से कहा कि हिंदी भारत को एक सूत्र में जोड़ने वाली भाषा है. इसे राजभाषा का दर्जा देना चाहिए. इसके बाद नेहरू और धुलेकर के बीच अनबन हो गई. 1957 में झांसी से डॉ. सुशीला नैय्यर को टिकट दिया गया. इसके बावजूद धुलेकर ने पार्टी का सम्मान रखा और डॉ. नैय्यर के लिए प्रचार किया.
हिंदी की पैरवी करने पर मिली सजा
हरगोविंद कुशवाहा बताते हैं कि 1957 के बार रघुनाथ धुलेकर ने केंद्र की राजनीति से संन्यास ले लिया. हिंदी की पैरवी करने की सजा उन्हें दी गई. इसके बाद वह 6 साल तक उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सभापति भी रहे. कार्यकाल पूरा होने के बाद उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया.
