प्लास्टिक के ये नैनो कण आंखों से नहीं दिखते, लेकिन शरीर में कर जाते हैं प्रवेश, रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा

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प्लास्टिक के ये नैनो कण आंखों से नहीं दिखते, लेकिन शरीर में कर जाते हैं प्रवेश

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Gargi College Student Research On Nano Plastic: गार्गी कॉलेज की छात्रा श्रुति की रिसर्च में सामने आया है कि माइक्रो और नैनोप्लास्टिक कई माध्यमों से शरीर के अंदर प्रवेश करती है. यह फेफड़ों, गट, दिमाग और प्रजनन अंगों के लिए खतरा बन सकती है. इससे शरीर में सूजन आ सकती है और इम्यूनिटी भी कमजोर हो सकती है.

दिल्ली. आज के समय में प्लास्टिक हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुकी है. पानी की बोतल से लेकर खाने की पैकिंग और रोजमर्रा की कई चीजों में प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है. लेकिन यही प्लास्टिक अब हमारी सेहत के लिए चिंता का कारण बनती जा रही है. जब प्लास्टिक छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटती है, तो वह माइक्रो और नैनोप्लास्टिक में बदल जाती है. ये इतने छोटे होते हैं कि आंखों से दिखाई भी नहीं देते, लेकिन हवा, भोजन और सांस के जरिए आसानी से हमारे शरीर में पहुंच सकते हैं.

रिसर्च में सामने आई चौंकाने वाली बातें
दिल्ली के गार्गी कॉलेज के बीएससी माइक्रोबायोलॉजी विभाग की छात्रा श्रुति ने इस विषय पर रिसर्च की है. उनके अनुसार, माइक्रो और नैनोप्लास्टिक शरीर में जाने के बाद फेफड़ों, पेट (गट), दिमाग और प्रजनन अंगों तक पहुंच सकती है. रिसर्च में यह भी देखा गया कि ये कण शरीर में सूजन (इन्फ्लेमेशन) बढ़ाने का कारण बन सकते हैं. धीरे-धीरे यह शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली को कमजोर कर देते हैं, जिससे दूसरे हानिकारक तत्व भी आसानी से शरीर में प्रवेश कर सकते हैं.

क्यों बढ़ रही है चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि प्लास्टिक का इस्तेमाल पूरी तरह बंद करना आसान नहीं है, क्योंकि आज लगभग हर चीज में इसका उपयोग हो रहा है. ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि इसके नुकसान को कम करने के तरीके खोजे जाएं. श्रुति का कहना है कि अगर समय रहते इस विषय पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में यह एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या बन सकती है.

आगे क्या है योजना
इस रिसर्च का उद्देश्य सिर्फ जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि लोगों को जागरूक करना भी है. टीम की योजना इस रिसर्च को एक अच्छे जर्नल में प्रकाशित करने की है, ताकि नीति-निर्माताओं तक इसकी जानकारी पहुंचे. आगे चलकर क्लीनिकल ट्रायल्स के जरिए ऐसे सुरक्षित उपाय या सप्लीमेंट्स पर भी काम किया जा सकता है, जो माइक्रो और नैनोप्लास्टिक के शरीर पर पड़ने वाले असर को कम करने में मदद करें.

श्रुति ने कहा, हालांकि प्लास्टिक को पूरी तरह जीवन से हटाना मुश्किल है, लेकिन इसके इस्तेमाल को कम करना, सिंगल यूज प्लास्टिक से बचना और लोगों में जागरूकता बढ़ाना इस खतरे को कम करने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है.

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Raina Shukla

बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी से मास कम्यूनिकेशन एंड जर्नलिज़्म में मास्टर्स, गोल्ड मेडलिस्ट. पत्रकारिता का सफर दैनिक जागरण से शुरू हुआ, फिर प्रभात खबर और ABP न्यूज़ से होते हुए News18 Hindi तक पहुंचा. करियर और देश की …और पढ़ें

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