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दिल्ली सिर्फ इमारतों का शहर नहीं, बल्कि खो चुकी यादों का भी शहर है. कभी चांदनी चौक में नहरें बहती थीं, सड़कों पर ट्राम दौड़ती थी और डबल-डेकर बसें राजधानी की शान मानी जाती थीं. अप्पू घर बच्चों की सबसे पसंदीदा जगह था, जबकि लाल किले की नहर-ए-बहिश्त मुगल इंजीनियरिंग का अद्भुत उदाहरण थी. समय के साथ विकास, भीड़ और बदलती जरूरतों ने इन ऐतिहासिक पहचान को खत्म कर दिया. अब दिल्ली जिमखाना क्लब भी उसी राह पर दिखाई देता है. आज दिल्ली की कई ऐसी धरोहरें सिर्फ तस्वीरों, कहानियों और बुजुर्गों की यादों में जिंदा हैं, जिन्हें नई पीढ़ी शायद कभी महसूस नहीं कर पाएगी.
दिल्ली की 10 विरासतें जो अब सिर्फ कहानियों में जिंदा हैं.
चांदनी चौक की नहरें: पुरानी दिल्ली का चांदनी चौक आज भीड़ और ट्रैफिक के लिए जाना जाता है, लेकिन एक समय ऐसा था जब यहां सड़क के बीचों-बीच पानी की सुंदर नहर बहती थी. मुगल बादशाह शाहजहां ने इस नहर को बनवाया था, जिसे फैज नहर कहा जाता था. रात के समय इसमें चांद की रोशनी चमकती थी और इसी वजह से इस बाजार का नाम चांदनी चौक पड़ा. नहर के किनारे संगमरमर के चबूतरे बने थे, जहां लोग शाम बिताने आते थे. व्यापारी और अमीर परिवार यहां टहलते थे और आसपास की रौनक देखते थे. 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने सुरक्षा और सड़क विस्तार के कारण इस नहर को धीरे-धीरे बंद करना शुरू कर दिया. 1910 तक इसे पूरी तरह पाट दिया गया.
दिल्ली की ऐतिहासिक ट्राम: दिल्ली में कभी ट्राम भी चला करती थी, यह बात आज की पीढ़ी के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं लगती है. 6 मार्च 1908 को पहली इलेक्ट्रिक ट्राम दिल्ली की सड़कों पर उतरी थी. यह ट्राम चांदनी चौक, जामा मस्जिद और पहाड़गंज जैसे इलाकों को जोड़ती थी. उस समय इसे आधुनिक दिल्ली की पहचान माना जाता था. ट्राम में ऊपर बैठकर बाजारों का नजारा देखना लोगों के लिए खास अनुभव होता था. किराया भी इतना कम था कि आम लोग आसानी से सफर कर सकते थे. धीरे-धीरे दिल्ली की आबादी बढ़ी और सड़कों पर वाहनों की संख्या भी बढ़ने लगी. ट्राम की धीमी रफ्तार ट्रैफिक जाम की वजह बनने लगी. आर्थिक नुकसान और बस सेवाओं के विस्तार के कारण 1963 में इस सेवा को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया.
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लाल किले का नहर-ए-बहिश्त: लाल किले की खूबसूरती सिर्फ उसकी दीवारों तक सीमित नहीं थी. यहां एक खास जल प्रणाली भी थी, जिसे नहर-ए-बहिश्त कहा जाता था. मुगल काल में यमुना का पानी शाह बुर्ज तक पहुंचाया जाता था और वहां से यह नहर महलों के अंदर बहती थी. दीवान-ए-खास के नीचे से गुजरता पानी गर्मियों में कमरों को ठंडा रखता था. इसे उस दौर का प्राकृतिक एयर-कंडीशनर कहा जाता था. माना जाता है कि इससे तापमान कई डिग्री तक कम हो जाता था. पानी की आवाज और ठंडक शाही परिवार को आराम देती थी. 1857 के बाद अंग्रेजों ने लाल किले को सैनिक छावनी में बदल दिया और इस पूरी व्यवस्था को खत्म कर दिया. समय के साथ यमुना का रास्ता भी बदल गया.
अप्पू घर: 1980 और 90 के दशक में दिल्ली के बच्चों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण अप्पू घर हुआ करता था. प्रगति मैदान में बने इस थीम पार्क का उद्घाटन 1984 में किया गया था. यहां का जायंट व्हील, रोलर कोस्टर और ड्रैगन ट्रेन बच्चों और युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय थे. स्कूल की पिकनिक का नाम आते ही बच्चों के चेहरे खिल उठते थे, क्योंकि ज्यादातर पिकनिक अप्पू घर ही जाया करती थीं. परिवार छुट्टी वाले दिन यहां घूमने आते थे और घंटों मनोरंजन करते थे. यह सिर्फ पार्क नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी की यादों का हिस्सा था. 2008 में इसकी लीज खत्म हो गई और सुप्रीम कोर्ट के नए परिसर के निर्माण के कारण इसे बंद करना पड़ा. बाद में गुरुग्राम में नया अप्पू घर बना, लेकिन पुरानी दिल्ली वालों के लिए असली अप्पू घर वही था, जो प्रगति मैदान में हुआ करता था.
दिल्ली की डबल-डेकर बसें: एक समय दिल्ली की सड़कों पर लाल रंग की डबल-डेकर बसें दौड़ा करती थीं. 1970 और 80 के दशक में ये बसें राजधानी की पहचान बन चुकी थीं. बच्चों को इन बसों की ऊपरी मंजिल पर बैठने का बेहद शौक होता था, खासकर सबसे आगे वाली सीट पाने की होड़ लगी रहती थी. ऊपर से कनॉट प्लेस और दिल्ली यूनिवर्सिटी के रास्तों का नजारा बेहद शानदार दिखाई देता था. पर्यटक भी इन बसों में सफर करना पसंद करते थे. लेकिन समय के साथ दिल्ली की सड़कें व्यस्त होती गईं. बिजली के तार, बड़े पेड़ और बढ़ता ट्रैफिक इन बसों के लिए परेशानी बनने लगे. रखरखाव का खर्च भी बढ़ता गया. आखिरकार 1990 के दशक में डीटीसी ने इन बसों को हटाने का फैसला लिया.
दिल्ली के खोए हुए ऐतिहासिक द्वार: शाहजहां ने जब शाहजहांनाबाद बसाया, तब शहर की सुरक्षा के लिए उसके चारों ओर विशाल दीवार और 14 भव्य दरवाजे बनाए गए थे. इन दरवाजों से लोग शहर में प्रवेश करते थे और हर दरवाजे का अपना अलग महत्व था. काबुली गेट, लाहौरी गेट, मोरी गेट और अजमेरी गेट जैसे नाम उस दौर की शान माने जाते थे. लेकिन अंग्रेजों के शासन और बाद में शहर के विस्तार के कारण इनमें से कई दरवाजों को तोड़ दिया गया. सड़क चौड़ीकरण और नई कॉलोनियों के निर्माण ने इन ऐतिहासिक संरचनाओं को खत्म कर दिया. आज केवल कुछ ही दरवाजे बचे हैं, जिनमें कश्मीरी गेट, दिल्ली गेट और तुर्कमान गेट प्रमुख हैं.
चांदनी चौक का घंटाघर: पुरानी दिल्ली का घंटाघर कभी शहर की सबसे प्रसिद्ध पहचान माना जाता था. अंग्रेजों ने 1868 में इस ऊंचे क्लॉक टॉवर का निर्माण कराया था. इसकी ऊंचाई करीब 128 फीट थी और इसकी घंटियों की आवाज दूर-दूर तक सुनाई देती थी. लोग समय देखने के लिए इस घंटाघर पर नजर डालते थे. यह जगह राजनीतिक सभाओं और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी काफी महत्वपूर्ण रही. लेकिन 1951 में अचानक इसका ऊपरी हिस्सा गिर गया, जिससे कई लोगों की जान चली गई. इसके बाद इसे असुरक्षित घोषित कर दिया गया. 1955 तक इस पूरे घंटाघर को गिरा दिया गया.
कुतुब मीनार की सीढ़ियां: आज लोग कुतुब मीनार को सिर्फ बाहर से देखते हैं, लेकिन एक समय ऐसा था जब इसके अंदर जाकर 379 सीढ़ियां चढ़ने की अनुमति थी. पर्यटक ऊपर पहुंचकर पूरी दिल्ली का नजारा देखते थे. 4 दिसंबर 1981 को शुक्रवार होने की वजह से यहां काफी भीड़ थी. अचानक अंधेरे में किसी ने अफवाह फैला दी कि कुतुब मीनार गिर रही है. इसके बाद मची भगदड़ में 45 लोगों की मौत हो गई. यह हादसा पूरे देश को हिला देने वाला था. घटना के बाद सरकार ने सुरक्षा कारणों से मीनार के अंदर जाने पर हमेशा के लिए रोक लगा दी.
महरौली का शाही झरना: महरौली में कभी एक ऐसा शाही झरना हुआ करता था, जहां लोग दूर-दूर से घूमने आते थे. मुगल काल में शम्सी तालाब के पानी से यह कृत्रिम झरना बनाया गया था. मानसून के दौरान यहां का दृश्य बेहद सुंदर दिखाई देता था. लोग परिवार के साथ पिकनिक मनाने आते थे और आसपास के बागों में समय बिताते थे. फूलवालों की सैर जैसे प्रसिद्ध त्योहार भी यहां आयोजित होते थे. यह जगह दिल्ली की गर्मी में लोगों को राहत देती थी. लेकिन समय के साथ अवैध निर्माण, गंदगी और भूजल स्तर कम होने के कारण यह झरना सूख गया. अब यहां केवल टूटे हुए ढांचे और वीरानी दिखाई देती है.
दिल्ली के खोए हुए मुगल बाग: मुगल काल में दिल्ली अपने सुंदर बागों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर थी. चारबाग शैली में बने ये उद्यान सिर्फ घूमने की जगह नहीं थे, बल्कि शाही जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थे. लाल किले का हयात बख्श बाग, रोशनारा बाग और करोल बाग जैसे स्थान हरियाली और फव्वारों से भरे रहते थे. लोग यहां सैर करने आते थे और शाही समारोह भी आयोजित होते थे. 1857 के बाद अंग्रेजों ने कई बागों को नष्ट कर वहां सैन्य बैरकें और इमारतें बना दीं. धीरे-धीरे बढ़ती आबादी और बाजारों ने इन बागों की जगह ले ली. करोल बाग का नाम तो बच गया, लेकिन वहां का असली बाग खत्म हो गया. आज वहां दुकानें, ट्रैफिक और भीड़ दिखाई देती है. दिल्ली के ये बाग कभी शहर की शान थे, लेकिन अब उनकी पहचान सिर्फ इतिहास की किताबों तक सीमित रह गई है.
ये थीं दिल्ली की धड़कनें.
