कपड़ों का कचरा बनेगा पर्यावरण और यमुना के लिए वरदान , IIT ने खोज निकाला कमाल का आइडिया

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कपड़ों का कचरा बनेगा पर्यावरण और यमुना के लिए वरदान , IIT ने की कमाल की खोज

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IIT Delhi Textile Research: आईआईटी दिल्ली कपड़ों के कचरे (टेक्सटाइल वेस्ट) और कृषि अवशेष से नई पर्यावरण अनुकूल तकनीक विकसित कर रही है. इस शोध के तहत विशेष मेम्ब्रेन तैयार किए जा रहे हैं. इनकी मदद से उद्योगों के गंदे पानी से हानिकारक डाई हटाई जा सकेगी. साथ ही, कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को भी कैप्चर किया जा सकेगा. शोधकर्ता टेक्सटाइल वेस्ट से रीसाइकल्ड पॉलिएस्टर और नए धागे भी तैयार कर रहे हैं, जिनसे दोबारा कपड़े बनाए जा सकेंगे.

दिल्ली: कपड़ों का कचरा अब सिर्फ बेकार नहीं रहेगा. इसका उपयोग पर्यावरण बचाने वाली नई तकनीक विकसित करने में किया जा रहा है. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) दिल्ली के टेक्सटाइल विभाग में प्रोफेसर अर्चना सामंथा के मार्गदर्शन में पीएचडी शोधार्थी शाश्वत मैनाक और उनकी टीम टेक्सटाइल वेस्ट तथा कृषि अवशेष (एग्रो वेस्ट) पर शोध कर रही है. इस शोध का उद्देश्य कपड़ों के कचरे का बेहतर उपयोग करना और पानी व हवा के प्रदूषण को कम करने के लिए नई तकनीक विकसित करना है.

मेम्ब्रेन से होगा गंदे पानी का उपचार
शोध के तहत टीम पॉलिएस्टर-कॉटन ब्लेंड टेक्सटाइल वेस्ट और एग्रो वेस्ट से विशेष प्रकार का मेम्ब्रेन तैयार कर रही है. इस मेम्ब्रेन का उपयोग उद्योगों से निकलने वाले गंदे पानी में मौजूद हानिकारक रंग (डाई) को हटाने के लिए किया जा सकता है. इसके अलावा यह तकनीक हवा में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को कैप्चर करने में भी मददगार हो सकती है. शोधकर्ताओं का मानना है कि भविष्य में यह तकनीक औद्योगिक प्रदूषण को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.

यमुना को साफ रखने में मिलेगी मदद
पीएचडी शोधार्थी शाश्वत मैनाक ने बताया कि यमुना नदी में झाग बनने और पानी का रंग बदलने की एक बड़ी वजह टेक्सटाइल फैक्ट्रियों से निकलने वाला दूषित पानी है. यदि फैक्ट्रियों में इस विशेष मेम्ब्रेन का इस्तेमाल किया जाए, तो गंदे पानी को नदी में छोड़ने से पहले उसमें मौजूद डाई और अन्य प्रदूषकों को काफी हद तक हटाया जा सकता है. इससे यमुना जैसी नदियों को प्रदूषण से बचाने में मदद मिलेगी.

कपड़ों के कचरे से फिर बनेंगे नए कपड़े
शोध टीम टेक्सटाइल वेस्ट से रीसाइकल्ड पॉलिएस्टर और सेल्यूलोज भी तैयार कर रही है. इनसे नए धागे यानी फिलामेंट बनाए जा रहे हैं. इन धागों का उपयोग दोबारा कपड़े बनाने में किया जा सकता है. इसका मतलब है कि जो कपड़े पहले कचरा बन जाते थे, उन्हें अब दोबारा उपयोग के लायक बनाया जा सकेगा. इससे टेक्सटाइल वेस्ट भी कम होगा और संसाधनों की बचत भी होगी.

तैयार हो रहा हाई-परफॉर्मेंस सेफ्टी फैब्रिक
इस शोध का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा ऐसा विशेष कपड़ा तैयार करना है, जो आग, रसायनों और अधिक तापमान का आसानी से सामना कर सके. सबसे खास बात यह है कि यह फैब्रिक पूरी तरह भारत में विकसित किए गए हाई-परफॉर्मेंस फाइबर से तैयार किया जा रहा है. शोधकर्ताओं का दावा है कि उनके द्वारा तैयार किए गए फिलामेंट की मजबूती विदेशों से आयात होने वाले Nomex फैब्रिक से भी अधिक है. यदि यह तकनीक बड़े स्तर पर सफल होती है, तो भारत को ऐसे महंगे सुरक्षा फैब्रिक के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा.

पर्यावरण के साथ अर्थव्यवस्था को भी लाभ
शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि इस तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाया जाता है, तो टेक्सटाइल इंडस्ट्री से निकलने वाले कचरे का बेहतर उपयोग होगा. नदियों में जाने वाला दूषित पानी कम होगा. हवा में कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर को घटाने में भी मदद मिलेगी. साथ ही देश में उच्च गुणवत्ता वाले सेफ्टी फैब्रिक का उत्पादन बढ़ेगा और आयात पर निर्भरता कम होगी. इस तरह एक ही शोध के जरिए कपड़ों के कचरे, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण और विदेशी उत्पादों पर निर्भरता जैसी कई बड़ी समस्याओं का समाधान निकल सकता है.

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Amita kishor

न्यूज़18इंडिया में कार्यरत हैं. आजतक से रिपोर्टर के तौर पर करियर की शुरुआत फिर सहारा समय, ज़ी मीडिया, न्यूज नेशन और टाइम्स इंटरनेट होते हुए नेटवर्क 18 से जुड़ी. टीवी और डिजिटल न्यूज़ दोनों विधाओं में काम करने क…

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