Harish Rana last Words : हरीश राणा की वो आखिरी इच्छा, जो अब मां-बाप के सीने में ताउम्र एक बोझ बनकर रहेगी

नई दिल्ली. इंसान के सपने कितने नाजुक होते हैं, इसका अंदाजा एम्स दिल्ली के आईसीयू बेड पर लेटे हरीश राणा को देखकर लगाया जा सकता है. वह हरीश राणा (Harish Rana), जो 13 साल पहले तक अपने माता-पिता का हाथ थामकर उन्हें सुनहरे भविष्य के सपने दिखा रहा था, आज खुद मशीनों के सहारे अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है. हरीश को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पिछले सप्ताह एम्स दिल्ली के ट्रॉमा सेंटर में भर्ती करवाया गया है. हरीश राणा की पैसिव इच्छामृत्यु की प्रक्रिया दिल्ली एम्स में अंतिम चरण में है. सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च 2026 के ऐतिहासिक आदेश के बाद उनका वेंटिलेटर और फीडिंग ट्यूब पूरी तरह हटा दिया गया है. लेकिन मां-बाप को उनकी कही बातों को आज भी नहीं भुला रहे हैं.

हरीश राणा एक बेहद साधारण परिवार से आते हैं. 13 साल पहले उसके साथ जब हादसा हुआ था, वह तकरीबन 19-20 साल के थे. जब वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के लिए चंडीगढड जा रहे थे तो मां के पैर छूकर एक वादा किया था. ‘मां, अगली बार जब घर आऊंगा, तो तुम्हें बद्रीनाथ की यात्रा पर ले जाऊंगा.’ हरीश की यह आखिरी इच्छा अपने मां-बाप को तीर्थ यात्रा कराना-आज एक गहरे जख्म की तरह उनके सीने में चुभ रही है. मां अस्पताल के फर्श पर बैठी बस यही बुदबुदा रही हैं, ‘बेटा, मुझे बद्रीनाथ नहीं जाना, बस तू अब बिना दर्द के इस दुनिया से चला जा.’ पिता, जो खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वह भी बेटे की आखिरी इच्छा अपने सगे-संबंधियों को बोलकर भावुक हो जाते हैं.

हरीश राणा और कितने दिन के मेहमान?

हरीश राणा की पैसिव इच्छामृत्यु की प्रक्रिया दिल्ली एम्स में अंतिम चरण में है. सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च 2026 के ऐतिहासिक आदेश के बाद उनका वेंटिलेटर और फीडिंग ट्यूब पूरी तरह हटा दिया गया है. अब वे आईसीयू से निकालकर नॉर्मल बेड पर रखे गए हैं. हालत स्थिर है, लेकिन डॉक्टर ब्रेन को शांत रखने वाली दवाएं पैलिएटिव सेडेशन दे रहे हैं ताकि कोई दर्द न हो. न्यूट्रिशन सपोर्ट भी रोक दिया गया है. डॉ. सीमा मिश्रा की अगुवाई में मेडिकल बोर्ड हर घंटे नजर रख रहा है. परिवार रोज आ रहा है, काउंसलिंग हो रही है. प्रक्रिया में कुल 2-3 हफ्ते लग सकते हैं. अभी कोई चमत्कार नहीं हुआ, न ही मौत हुई है. अंगदान की बात भी परिवार से चल रही है.

कहानी हरीश राणा की

32 साल का हरीश राणा गाजियाबाद से पंजाब यूनिवर्सिटी में बीटेक करने गया था. साल 2013 में एक दुर्घटना में सिर में गंभीर चोट लगी. उसके बाद वे स्थायी वेजिटेटिव स्टेट यानी कोमा जैसी स्थिति में चला गया. हरीश राणा 13 साल से बिस्तर पर है और वह बोल नहीं सकता, हिल नहीं सकता. मां-बाप ने घर औऱ जमीन बेचकर वेंटिलेटर और ट्यूब से जिंदा रखा था. लेकिन वह भी अब थक गए. मां-बाप की उम्र 70 पार हो गया है. भाई-बहन स्कूल छोड़कर मदद करते. परिवार ने ब्रह्मा कुमारी से आध्यात्मिक सहारा लिया, लेकिन दर्द नहीं गया. हरीश की आंखें बंद थीं, लेकिन दिल धड़कता रहा. फिर एक दिन मां-बाप ने फैसला लिया – ‘बेटा, अब तू थक गया होगा. हमें तुझे जाने देना है, दर्द के बिना.’

11 मार्च 2026 को देश का पहला पैसिव इच्छामृत्यु का केस कोर्ट ने मान लिया. मेडिकल बोर्ड ने पुष्टि की कि स्थिति ठीक होने लायक नहीं है. 14 मार्च 2026 को उन्हें एम्स दिल्ली के पेलिएटिव केयर यूनिट ट्रॉमा सेंटर बेड नंबर 12 कैंसर अस्पताल वाले वार्ड में भर्ती कराया गया. 14 मार्च 2026 से यानी बीते 9 दिन हो चुके हैं. पहले हरीश राणा को आईसीयू में रखा गया है.

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