Delhi Surface Temperature: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली पर एक नई आफत आ गई है. लेकिन, इस बार यह आफत आसमानी नहीं बल्कि पाताल लोक से उपजी है. ऐसे में हर एक दिल्लीवासी को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी. दरअसल, हम बात कर रहे है एक ताजा रिपोर्ट की. इसमें कहा गया है कि दिल्ली की धरती इस वक्त आग उगल रही है. यह आग धरती के भीतर किसी लावा या ज्वालामुखी की वजह से नहीं बल्कि हमारे कर्मों की सजा है. इस आग की वजह से हर एक दिल्लीवासी की सेहत पर असर पड़ेगा. इस मार का असर बच्चे और बुजुर्गों की सेहत पर सबसे ज्यादा पड़ेगा.
इंडियन एक्सप्रेस अखबार की एक रिपोर्ट के मुताबिक में राजधानी नई दिल्ली में तेजी से बढ़ते तापमान और शहरी हीट स्ट्रेस की गंभीर तस्वीर पेश की गई है. थिंक-टैंक इंवायरोकैटालिस्ट्स द्वारा जारी इस सैटेलाइट आधारित विश्लेषण के अनुसार मार्च महीने में दिल्ली का औसत लैंड सरफेस टेम्परेचर (LST) पिछले 11 वर्षों में लगभग तीन डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है. यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि शहरीकरण के अनियंत्रित मॉडल और पर्यावरणीय उपेक्षा का स्पष्ट संकेत है.
क्या है LST और क्यों है यह अहम?
दिल्ली के 247 वार्ड्स के विश्लेषण में यह भी सामने आया कि तापमान वृद्धि पूरे शहर में समान नहीं है. दक्षिण दिल्ली के संगम विहार-ए वार्ड में 6.1°C की वृद्धि दर्ज की गई, जो सबसे अधिक है. इसके अलावा मीठापुर, मदनगीर और तिगरी जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में भी 5°C के आसपास बढ़ोतरी देखी गई. यह साफ संकेत देता है कि घनी आबादी, कंक्रीट का विस्तार और हरियाली की कमी सीधे तौर पर सतह के तापमान को बढ़ा रही है.
दिल्ली में गर्मी की स्थिति साल दर साल बिगड़ती जा रही है. फोटो- रायटर
शहर के भीतर हीट असमानता
इंसान पर असर
रिपोर्ट में यूनिवर्सल थर्मल क्लाइमेट इंडेक्स (UTCI) का भी विश्लेषण किया गया है, जो यह बताता है कि इंसान को गर्मी कितनी ज्यादा महसूस हो रही है. 2015 से 2025 के बीच मई और जून में दिल्ली के सभी 247 वार्ड लगातार लू की चपेट में रहे, जहां UTCI 32 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहा. कई इलाकों में सतह का तापमान 50 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा पहुंच गया. यह स्थिति केवल असुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है- खासतौर पर बुजुर्गों, बच्चों और मजदूर वर्ग के लिए.
रिपोर्ट का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि तेजी से हो रहे कंक्रीटीकरण ने दिल्ली की प्राकृतिक संरचना को बदल दिया है. जहां पहले पार्क, पेड़ और जल स्रोत थे, वहां अब इमारतें और पक्की सतहें हैं. ये सतहें दिनभर गर्मी सोखती हैं और रात में धीरे-धीरे छोड़ती हैं, जिससे अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव बढ़ता है.
